नई दिल्ली:– एकादशी के दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। साथ ही जीवन में सुख-शांति की प्राप्ति के लिए व्रत भी किया जाता है। हर माह में 2 बार एकादशी व्रत किया जाता है। एक कृष्ण और दूसरा शुक्ल पक्ष में। ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली निर्जला एकादशी 18 जून को है।
निर्जला एकादशी को क्यों कहा जाता है भीमसेनी एकादशी?
पौराणिक कथा के अनुसार, पांडवों में अधिक शक्तिशाली भीमसेन थे। उनको स्वादिष्ट भोजन का बहुत शौक था। उनसे अपनी भूख बर्दाश्त नहीं होती थी। इसलिए वह कभी भी एकादशी व्रत नहीं रख पाते थे। वहीं, पांडवों में भीम के अलावा सभी भाई और द्रौपदी सभी एकादशी व्रत को सच्चे मन से रखते थे। एक बार भीम अपनी इस कमजोरी के कारण परेशान हो गए। उनको ऐसा लगता था कि वह एकादशी व्रत नहीं कर पा रहे है, जिसकी वजह से श्री हरि का अपमान हो रहा है। इस समस्या का समाधान के लिए भीम महर्षि व्यास के पास पहुंच गए। महर्षि ने भीम को एकादशी व्रत अवश्य करने के लिए कहा। साथी यह भी कहा कि ज्येष्ठ माह माह में पड़ने वाली निर्जला एकादशी व्रत रखने से जातक को सभी 24 एकादशी व्रत करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। इसी वजह से निर्जला एकादशी व्रत को भीमसेनी एकादशी व्रत के नाम से जाना जाता है।
पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 17 जून को सुबह 04 बजकर 43 मिनट से होगी। वहीं इस तिथि का समापन 18 जून को सुबह 06 बजकर 24 मिनट पर होगा।
