नई दिल्ली:- हम आपको जानकारी के मुताबिक बता दे की चने में अधिक मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है इसलिए दलहनी फसलों में कीट और रोग का अधिक डर बना रहता है वही फसलों में रोग के कारण 20 प्रतिशत का नुकसान हो जाता है इसी वजह से 25 फीसदी प्रतिशत तक उत्पादन कम होता है।
चने की खेती के लिए जलवायु
हम आपको जानकारी के मुताबिक बता दे की चने के अंकुरण के लिये कुछ उच्च तापक्रम की आवश्यकता होती है परन्तु पौधों की वृद्धि के लिये साधारणतः ठंडक वाला मौसम बहुत ही उपयुक्त होता है, फसल के पकने के समय फिर उच्च तापक्रम की आवश्यकता होती है। ग्रीष्म काल में अगर प्रारम्भ में ही तापक्रम बहुत अधिक हो जाता है तो फसल समय से पूर्व ही पक जाती है। पाला फसल को बहुत हानि पहुँचाता है, इसके कारण फसल में फल और फूल नहीं बनते हैं।
चने की खेती के लिए भूमि कैसी होने चाहिए
हम आपको जानकारी के मुताबिक बता दे की चने की खेती के लिए हल्की एल्यूवियल भूमियों में सफलतापूर्वक की जा सकती है आम तौर पर हम आपको बता दे की ने की खेती दोमट भूमियों से मटियार भूमियों तक में सफलतापूर्वक की जाती है वही बम्बई और दक्षिणी भारत में जल धारण की क्षमता रखने वाली मटियार दोमट और काली मिट्टी में चने की खेती की जाती है।
चने की खेती के लिए खाद एवं उर्वरक
हम आपको जानकारी के मुताबिक बता दे की प्रारम्भ में 15-20 किग्रा. नत्रजन; 40-50 किग्रा. फास्फोरस सिंचित क्षेत्रों में व 20-30 किप्रा. फास्फोरस असिंचित क्षेत्रों में व 20-30 किग्रा. पोटाश प्रति हैक्टर, बुआई के समय खेत के कुँड में 9-10 सेमी० की गहराई पर देते हैं।
चने की खेती की सिंचाई
चने की खेती में सिंचाई की बात करे तो पहली सिंचाई शाखाएँ निकलने पर; बुआई के 30 दिन बाद, दूसरी सिंचाई बोने के 55-60 दिन बाद फूल आते समय करनी फायदेमन्द होती है और वही तीसरी सिंचाई फली बनते समय बोने के 85-90 दिन बाद करना होता है।
चने की खेती में निराई-गुड़ाई
हम आपको जानकारी के मुताबिक बता दे की बोने के 30-35 दिन बाद पहली निराई-गुड़ाई कर लेनी चाहिए।
चने के फसल की कटाई
हम आपको जानकारी के मुताबिक बता दे की फसल की कटाई बोने के 120 दिन बाद दाने जब सख्त होने प्रारम्भ होते हैं, काट ली जाती है, साधारणतया फसल 150-170 दिन में पककर तैयार हो जाती है।
