नई दिल्ली:- सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड को असंवैधानिक बताते हुए तत्काल प्रभाव से उसपर रोक लगा दी है, लेकिन सवाल है कि इस फैसले का आम आदमी पर असर क्या होगा. क्या अब आम आदमी जान पाएगा कि दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी को चंदा कौन देता है और कितना देता है. क्या जनता को इस बात का पता चल पाएगा कि वो जिस पार्टी को वोट देते हैं, उसे पैसे कौन देता है और उस पार्टी के पास कितना पैसा है. आखिर सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच के इस फैसले का चुनावी साल में क्या होगा असर,
चुनावी बॉन्ड राजनीतिक दलों को चंदा देने का एक तरीका है. इस व्यवस्था को मोदी सरकार में 2 जनवरी, 2018 को लागू किया गया था. तब सरकार ने इसके पक्ष में दलील दी थी कि इससे राजनीति फंडिंग में पारदर्शिता बढ़ेगी और सियासी दलों को चंदे के तौर पर ब्लैक नहीं बल्कि वॉइट मनी मिलेगी. इस स्कीम में राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए कोई भी शख्स, कॉरपोरेट या फिर कोई संस्था बॉन्ड खरीद सकती है. राजनीतिक दल उस बॉन्ड को बैंक में भुनाकर वो पैसा पार्टी के खाते में जमा कर सकते हैं. अभी तक देश में सिर्फ स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ही चुनावी बॉन्ड जारी कर सकता है. इसके लिए देश भर में स्टेट बैंक के 29 ब्रांच इसके लिए अधिकृत हैं, जिनमें नई दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, गांधीनगर, चंडीगढ़, पटना, रांची, गुवाहाटी, भोपाल, जयपुर और बेंगलुरु के ब्रान्च हैं. स्टेट बैंक की ये शाखाएं साल में चार बार जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर में बॉन्ड डारी करती हैं और जिसे खरीदना होता है, वो बैंक जाकर या फिर ऑनलाइन उसे खरीद सकता है.
चुनावी बॉन्ड से चंदा देने का फायदा क्या है
स्टेट बैंक जो चुनावी बॉन्ड जारी करता है, वो एक हजार रुपये से लेकर एक करोड़ रुपये तक के होते हैं. इनमें एक हजार का बॉन्ड, 10 हजार का बॉन्ड, एक लाख का बॉन्ड, 10 लाख का बॉन्ड और एक करोड़ का बॉन्ड होता है. जिसे भी राजनीतिक दलों को चंदा देना होता है, वो बैंक से बॉन्ड खरीदकर चंदा दे सकता है. हालांकि खरीदार कैश में बॉन्ड नहीं खरीद सकता है और उसे बैंक में केवाईसी दर्ज करवानी होती है. इस स्कीम के जरिए चंदा देने वाले की पहचान उजागर नहीं होती है. यानी कि किसी को पता नहीं चलता है कि किसने किस पार्टी को कितना पैसा दिया है. बाकी जिसने भी चंदे के तौर पर बॉन्ड के जरिए पैसा दिया होता है, उसे टैक्स में छूट मिलती है.
कौन सी पार्टी को बॉन्ड से मिलता है चंदा
जन प्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 29A के तहत पंजीकृत राजनीतिक दल चुनावी बॉण्ड स्वीकार कर सकते हैं. इलेक्टोरल बॉन्ड से चंदा लेने की शर्त ये है कि उस पार्टी को पिछले लोकसभा चुनाव में कम से कम 1 फीसदी वोट हासिल हुए हों. बॉन्ड खरीदने के 15 दिन के अंदर पार्टी को वो रकम अपने रजिस्टर्ड बैंक खाते में जमा करनी होती है. अगर पार्टी ऐसा नहीं करती है तो बॉन्ड रद्द हो जाता है.
