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    आज मनाया जाता है वर्ल्ड टीबी डे, 142 सालों में कहां तक लड़ पाए हम इस बीमारी से, जानिए……

    By Tv 36 HindustanMarch 24, 2024No Comments5 Mins Read
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    टीबी का नाम सुनते ही किसी समय लोगों के शरीर में सिहरन पैदा हो जाती थी, क्योंकि तब इस बीमारी का कोई इलाज नहीं था. टीबी का पूरा नाम ट्यूबरक्लोसिस है. इसे हिन्दी में तपेदिक या क्षय रोग कहते हैं. यह एक संक्रामक बीमारी है, जिसके बारे में पहले बेहद कम ही जानकारी थी. फिर 24 मार्च 1882 को एक जर्मन वैज्ञानिक ने ट्यूबरक्लोसिस की मूल वजह को खोज निकाला. इस क्रांतिकारी खोज के मौके पर दुनियाभर में 24 मार्च को वर्ल्ड टीबी डे मनाया जाता है.ट्यूबरक्लोसिस ऐसी बीमारी है जो धीरे-धीरे शरीर को खोखला करती जाती है. यह आमतौर पर इंसान के फेफड़ों पर हमला करती है और धीरे-धीरे दिमाग या रीढ़ की हड्डी और शरीर के दूसरे हिस्सों में भी फैल सकती है.

    काफी समय तक किसी को पता नहीं था कि आखिर यह बीमारी होती कैसे है और बड़ी संख्या में लोगों की जान चली जाती थी. वर्ल्ड टीबी डे के मौके पर आइए जानते हैं कि आज इस बीमारी की क्या स्थिति है.

    टीबी के लिए जिम्मेदार है यह बैक्टीरियासाल 1882 में 24 मार्च को जर्मनी के एक वैज्ञानिक रॉबर्ट कोच ने कमाल कर दिखाया. उन्होंने बताया कि टीबी जैसी घातक बीमारी एक बैक्टीरिया के कारण होती है, जिसे माइक्रोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस कहते हैं. जब बीमारी का कारण पता चल गया तो इलाज खोजना भी आसान हो गया. सैकड़ों रिसर्च के बाद लगातार नई दवाएं तैयार की जाती रहीं. इससे यह उम्मीद बंध गई थी कि जल्द ही इसको जड़ से उखाड़ फेंका जाएगा

    .डॉ. रॉबर्ट कोच की खोज के चलते टीबी का इलाज मुमकिन हुआ तो उनको साल 1905 में नोबेल पुरस्कार से भी नवाजा गया. साथ ही इस बीमारी को लेकर दुनिया भर के लोगों को जागरूक करने के लिए 24 मार्च की तारीख को चुना गया. आज हर साल 24 मार्च को पूरी दुनिया में विश्व तपेदिक दिवस यानी वर्ल्ड टीबी डे मनाया जाता है.शरीर में कैसे फैलता है टीबी?डॉ. रॉबर्ट कोच ने खुलासा किया था कि शरीर में टीबी की शुरुआत माइक्रोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस के संक्रमण के कारण होती है. हालांकि, शुरुआत में इसका कोई लक्षण नहीं दिखता है पर अंदर ही अंदर संक्रमण बढ़ता जाता है. इसके साथ ही शरीर में परेशानियां भी बढ़ने लगती हैं. खांसी के साथ बलगम और फिर खांसी के साथ मुंह से खून आने लगता है. शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता कम होती जाती है.

    जागरूकता के लिए हर साल खास थीम142 साल पहले टीबी का कारण खोजे जाने के बावजूद अब तक इसका पूरी तरह से खात्मा नहीं किया जा सका है. विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ ने इसे अब भी दुनिया की सबसे घातक संक्रामक बीमारियों की कैटेगरी में रखा है और हर साल खास थीम पर विश्व टीबी दिवस मनाया जाता है. इस थीम के जरिए टीबी को जड़ से खत्म करने के लिए लोगों को जागरूक किया जाता है. डब्ल्यूएचओ ने साल 2030 तक पूरी दुनिया से टीबी को खत्म करने का लक्ष्य रखा है तो भारत सरकार ने 2025 में ही इसे खत्म करने का मन बना लिया है.आंकड़ों में हालात बहुत आशाजनक नहींयह और बात है कि आंकड़े कुछ और ही गवाही दे रहे हैं.

    विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों की मानें तो पूरी दुनिया के कुल टीबी मरीजों में से दो तिहाई मामले केवल आठ देशों में पाए जाते हैं. साल 2021 में पूरी दुनिया में करीब 1.06 करोड़ लोग टीबी से पीड़ित थे. इनमें से एक चौथाई मामलों के साथ भारत पहले स्थान पर है, जहां दुनिया भर के टीबी मरीजों में से 27 से 28 फीसदी मरीज पाए जाते हैं. भारत में टीबी से हर साल करीब चार लाख लोगों की जान चली जाती है. दूसरे स्थान पर चीन है, जहां दुनिया के कुल मरीजों में से नौ फीसदी मरीज मिलते हैं. इसके बाद इंडोनेशिया में आठ फीसदी, फिलीपींस में छह फीसदी, पाकिस्तान में छह फीसदी और नाइजीरिया में चार फीसदी टीबी मरीज मिलते हैं.ये दिग्गज भी हुए टीबी के शिकारटीबी का कारण पता चलने से पहले जब यह लाइलाज बीमारी थी तो बड़ों-बड़ों को इसने अपना शिकार बनाया था.

    लेखक प्रेमचंद हों या फ्रांज काफ्का, जॉर्ज ऑरवेल से लेकर जॉन कीट्स तक को इसी ने निशाना बनाया. पाकिस्तान के कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना ही नहीं, भारत की पहली महिला डॉक्टर आनंदी गोपाली जोशी की भी मौत का कारण टीबी की बीमारी ही थी. महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन और कमला नेहरू की मौत भी इसी के कारण हुई थी.टीबी के इलाज में लापरवाही पड़ती है भारीकुछ शिक्षा का अभाव और कुछ लापरवाही के कारण इसके खात्मे में आज भी सफलता नहीं मिल पाती है. दरअसल, लोग थोड़ी सी राहत मिलते ही दवा बंद कर देते हैं और धीरे-धीरे टीबी का बैक्टीरिया अपने भीतर उस दवा की प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेता है. इसके कारण शुरू में जो बीमारी आसानी से काबू में आ सकती है, उसके लिए हाईडोज एंटीबायोटिक दवाएं देने की जरूरत पड़ जाती है.

    भारत में ऐसे मरीजों का सालाना आंकड़ा करीब एक लाख होता है, जिन्हें मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट कहा जाता है. यानी इन पर एक साथ कई दवाओं का भी कोई असर नहीं पड़ता और नए सिरे से एक साथ कई एंटीबायोटिक दवाएं देनी पड़ती हैं.

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