नई दिल्ली:– आपके लिए स्वतंत्रता का अर्थ क्या है? अगर आपसे कोई यह सवाल करे, तो सभी लोगों के पास अपने-अपने जवाब होंगे लेकिन क्या आप जानते हैं कि सांसरिक बातों से अलग भगवान श्रीकृष्ण ने स्वतंत्रता के बारे में गीता में क्या कहा है? गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि जो व्यक्ति जीवन में काम, मोक्ष, लालच, स्वार्थ जैसी बुराइयों से पार पा लेता है, वह मनुष्य सही मायनों में स्वतंत्र हो जाता है। आइए, जानते हैं भगवान श्रीकृष्ण का गीता का ज्ञान, जिसमें आपको सच्ची स्वतंत्रता, मोक्ष और मुक्ति का अंतर समझ आएगा।
जीवन में कुछ बातें ऐसी हो जाती हैं, जो हमारे मन पर गहरी छाप छोड़ती हैं। हमारे मन के भीतर में इन पुरानी बातों और यादों की वजह से दुख पनपता रहता है। भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे मनुष्य मृत्यु समझता है, वास्तव में वही तो जीवन है। सोचकर देखें, तो एक क्षण में मनुष्य करोड़ों का स्वामी बन जाता है और दूसरे ही क्षण में मनुष्य दरिद्र हो जाते हो। व्यक्ति को पुरानी बातों और यादों से स्वतंत्र होकर परिवर्तन को अपनाना चाहिए।
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि केवल बंधन से मुक्ति ही असली स्वंतत्रता नहीं है बल्कि जीवन में कर्म करने की स्वतंत्रता भी एक सौभाग्य ही है। केवल मनुष्य को ही यह सौभाग्य प्राप्त है कि वह नए कर्म करने के लिए स्वतंत्र है, जिससे कि वे अपने लक्ष्य को भेदने के लिए निरंतर मेहनत करते रहे और यही कर्मठता उसे एक सर्वश्रेष्ठ मनुष्य बनाएगी। ऐसा मनुष्य को अपने कर्म को ही अपना धर्म बना लेता है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि भय के साए में जी रहा मनुष्य कभी भी साहसपूर्ण निर्णय नहीं ले सकता है, उसे हमेशा ही भय लगता है। भय भी बंधन का ही एक रूप है, इसलिए आपको विवेक और साहसपूर्ण फैसले लेने के लिए भय से स्वतंत्र रहना चाहिए। निर्भीक होकर काम करने से लक्ष्य पूरा होता है, अगर किसी अन्य कारण से लक्ष्य पूरा नहीं होता, तो भी मनुष्य का व्यक्तित्व जरूर निखरता है, उसे जीवन में कोई न कोई सबक जरूर मिल जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण गीता में अर्जुन को संदेश देते हैं कि हर मनुष्य दूसरों से विचार-विमर्श करता है और सलाह लेता है लेकिन अंत में उसे अपनी बुद्धि से ही काम लेना चाहिए क्योंकि उसे अपने विषय में ऐसी बातें भी पता होती हैं, जो वे किसी दूसरे से नहीं कह सकता है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को पूरा ज्ञान देने के बाद यह स्वतंत्रता दी थी कि वह स्वविवेक से निर्णय ले सके और कार्य करे। भगवान श्रीकृष्ण प्रत्येक मनुष्य को स्वाश्रित यानी आत्मनिर्भर बने रहकर दूसरों पर निर्भरता से स्वतंत्र रहने का संदेश देते हैं।
धरती पर आकर हम सभी कभी न कभी ऐसी माया में फंस जाते हैं, जब न चाहकर भी हमारे अंदर अंहकार का जन्म हो जाता है। हम किसी की कही हुई छोटी-सी बात पर इतना क्रोधित हो जाते हैं कि सोच ही नहीं पाते कि उसकी बातों से हमारा सच नहीं बदल जाता। भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि मनुष्य को अपना लक्ष्य पूरा करने के लिए क्रोध, काम, लालच, अंहकार, क्रोध और कठोर वाणी जैसी बुराइयों से भी स्वतंत्र रहना चाहिए।
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि मनुष्य का कार्य केवल अपने व्यक्तित्व कर्तव्यों को पूरा करने का नहीं है बल्कि समाज के प्रति भी उसकी जिम्मेदारी बनती है। जीवन में परोपकार और समाज कल्याण का करना भी मनुष्य को स्वार्थ से मुक्ति दिलाने में योगदान देता है। समाज में अगर कुछ गलत हो रहा है या किसी के साथ अन्याय हो रहा है, तो मनुष्य का कर्तव्य है कि मौन रहने की बजाय उसे रोकने के लिए क्रम करें।
