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    वकील साहब नाम से मशहूर, कौन थे नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शक, जाने…

    By Tv 36 HindustanSeptember 19, 2024No Comments8 Mins Read
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    कुछ लोग तरक्की के आसमान खुद चूमने की जगह प्रतिभाओं को पहचानने और तराशने के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं. गुजरात में राष्ट्रीय स्वयं सेवक के प्रांत प्रचारक रहे वकील साहब के नाम से मशहूर लक्ष्मणराव ईनामदार ऐसे ही चंद लोगों में शामिल थे. लम्बे समय तक वे गुजरात में संघ के पर्याय रहे. अथक परिश्रम,लगन और समर्पण भाव से संघ की जड़ें उन्होंने गुजरात में मजबूती से जमा दीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बाल स्वयं सेवक के रूप में उनके जरिए संघ से जुड़े. फिर युवावस्था में मोदी के भटकाव के दौर में वकील साहब ही ने संघ में फिर से मोदी को सक्रिय किया.उन्होंने मोदी को पितातुल्य स्नेह और मार्गदर्शन दिया. मोदी के जीवन पर उनका कैसा प्रभाव रहा, इसका प्रमाण उन पर लिखी मोदी की किताब “संघयोगी वकील साहब; लक्ष्मणराव ईनामदार” है.

    रास्ते की तलाशमहाराष्ट्र के सतारा जिले के खटारा गांव में 21 सितंबर 1917 को जन्में लक्ष्मणराव ईनामदार सात भाइयों में तीसरे स्थान पर थे. उनके दो बहनें भी थीं. पिता सरकारी नौकरी में थे. ट्रांसफर होता रहता था. उन्होंने बच्चों की पढ़ाई के लिए सतारा में एक मकान ले लिया. व्यायाम का लक्ष्मणराव को शौक था लेकिन पहलवान बनने में उनकी दिलचस्पी नहीं थी. रुचि मंडल खड़े करने और खेल प्रतियोगिताएं कराने में थी. क्रांतिकारियों की कुर्बानियां और अंग्रेजी दमन चक्र उन्हें और उनके साथियों को विचलित करता था . कुछ करने का विचार आता लेकिन कोई दिशा नहीं सुझती थी.संघ से जुड़ाव ने दिशा दीसातवीं कक्षा के बाद आगे पढ़ाई के लिए लक्ष्मणराव पूना गए.

    मार्च 1935 में सुप्रसिद्ध एडवोकेट दादा साहब करींदकर के निवास पर उनकी संघ संस्थापक डॉक्टर केशवराव बलीराव हेडगेवार से भेंट हुई. बड़े भाई अप्पा साहब, गोपाल भाई गूजर के अलावा बीस-पच्चीस युवक वहां मौजूद थे. विदर्भ में संघ की शाखाएं प्रारंभ कर डॉक्टर साहब पश्चिम महाराष्ट्र के प्रवास पर थे. डॉक्टर साहब के प्रभावशाली शब्द, “हिंदू समाज को संगठित करने पर ही हमारा राष्ट्र अखंड और स्वतंत्र होगा” उपस्थित युवकों को जोश दे रहे थे.उन्होंने संघ से जुड़ने और सतारा में शाखा प्रारंभ करने का आग्रह किया. लक्ष्मणराव ने सोचने का अवसर मांगा. रात भर मनन किया. दूसरे दिन डॉक्टर साहब के सामने प्रतिज्ञा की, “हिंदू राष्ट्र स्वतंत्र करने हेतु मैं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का सदस्य बना हूं. संघ का कार्य मैं प्रमाणिकता से, निःस्वार्थ बुद्धि से, तन-मन-धन से करूंगा. इस व्रत पर जीवन पर्यंत चलूंगा. “लक्ष्मणराव ईनामदार का आगे का पूरे जीवन इस प्रतिज्ञा को सच में बदलने के लिए समर्पित रहा.

    iनिजाम हैदराबाद के जुल्म के खिलाफ जेल यात्रासंघ कार्य ने जीवन को दिशा दी. आर्थिक कठिनाइयों के बीच तीन टिफिन में चार लोगों के भोजन जैसे रास्ते निकाले. संघ की शाखाओं के लिए कई किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती. सभी साथियों के पास साइकिल न होती. कभी पैदल, कभी डबल सवारी से काम चलाया जाता. सरकारी नौकरी न करने का संकल्प था. फिर क्या किया जाए? वकालत पढ़ना बेहतर समझा. इंटर बाद पूना में ही एल. एल. बी. में प्रवेश लिया. पहले साल की परीक्षा उत्तीर्ण भी कर ली. लेकिन इसी बीच 1939 में निजाम हैदराबाद के हिंदुओं पर जुल्म के विरुद्ध भावानगर सत्याग्रह प्रारंभ हुआ. लक्ष्मणराव इसमें शामिल हुए. आगे का काफी समय जेल में बीता. पढ़ाई बाधित हो गई. पिता माधवराव स्वाभाविक रूप से नाराज थे. लेकिन लक्ष्मणराव की रिहाई ने उन्हें तसल्ली दी. आगे उन्होंने एल.एल.बी.की पढ़ाई भी पूरी की. पिता को लगा कि अब परिवार की गाड़ी पटरी पर चलेगी. बेशक गाड़ी आगे पटरी पर चली. लेकिन वकील साहब के लिए यह पटरी जिस पर आगे वे जीवंत पर्यंत चले वह संघ और समाज की थी.अहमदाबाद में नरेंद्र मोदी का सान्निध्य1940 में डॉक्टर हेडगेवार की मृत्यु बाद सरसंघचालक गुरु गोलवरकर के नेतृत्व में संघ का कार्य आगे बढ़ा. वकील साहब प्रचारकों की उस पहली टोली के सदस्य थे, जिन्होंने दिन -रात परिश्रम करके संघ की शाखाओं को गुजरात के नगरों से गांवों तक पहुंचाया और एक बड़े समाज को संघ से जोड़ा.

    पूना बाद 1942 में वे नवसारी (गुजरात) पहुंचे. उनका अगला पड़ाव अहमदाबाद के माणिक चौक स्थित वह भवन था, जिसके तीसरे मंजिल स्थित एक छोटे से कमरे से संघ की गतिविधियां संचालित होती थीं. बाद में अहमदाबाद प्रांतीय कार्यालय का निर्माण हुआ. यहां उनके सान्निध्य और संरक्षण में एक ऐसा युवा स्वयंसेवक आया, जिसे आगे देश की बागडोर की संभालनी थी. ये नरेंद्र मोदी थे. मोदी के जीवन को सार्थक दिशा देने में वकील साहब की बड़ी भूमिका थी.मोदी के लिए पितातुल्य थे वकील साहबनरेंद्र मोदी 1960 में पहली बार एक बाल स्वयंसेवक के रूप में वकील साहब के संपर्क में आए थे. 1969 में मोदी वडनगर के अपने पैतृक घर से निकल चुके थे. रामकृष्ण आश्रम बेलूर होते हुए वे अहमदाबाद अपने चाचा के यहां पहुंचे थे. यह युवा मोदी के लिए अनिश्चय का समय था. तय नहीं कर पा रहे थे कि आगे क्या करना है? एक बार वे फिर वकील साहब के संपर्क में आए और संघ कार्यालय के कमरा नंबर तीन में पहुंच गए. सामने ही कमरा नंबर एक था, जिसमें वकील साहब रहते थे.

    वहां मोदी ने संघ के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया.वहां का हर छोटा-बड़ा कार्य ,साफ-सफाई, सबके लिए चाय-नाश्ता बनाने से लेकर वकील साहब के कपड़े धोने तक के कार्य उन्होंने किए. वकील साहब उन्हें इसके लिए रोकते थे. मोदी कहते थे ,उन्हें ऐसा करना अच्छा लगता है. असलियत में वकील साहब मोदी के लिए पिता तुल्य बन चुके थे.

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीमोदी को आगे पढ़ने की प्रेरणा भी वकील साहब सेवकील साहब को मोदी में अपार संभावनाएं दिखीं. संघ दृष्टि से जो भी दायित्व सौंपा, उसे मोदी ने बखूबी पूरा किया. ये वकील साहब ही थे, जिन्होंने मोदी को आगे की पढ़ाई के लिए प्रेरित किया. उन दिनों मोदी संघ के प्रचारक बन चुके थे. वकील साहब ने उनसे एक दिन कहा, “भगवान ने तुझे इतनी बुद्धि शक्ति दी है. फिर अपनी पढ़ाई पूरी कर.”बाद में वकील साहब ने खुद दिल्ली विश्वविद्यालय से इस सिलसिले में जानकारी हासिल की. वहां के एक्सटर्नल छात्र के रूप में मोदी स्नातक हुए. आगे गुजरात विश्वविद्यालय से उन्होंने एम.ए. किया. वहां उन्हें गाइड करने वाले प्राध्यापक प्रवीण सेठ के अनुसार नरेंद्र मोदी मेरे वर्ग में नूतन राज्यशास्त्र पढ़ते थे. संघ के प्रचारक थे, इस कारण काफी व्यस्त रहते थे. वे जब भी आते, मैं उनको विषय की फाइल देता. रेगुलर पढ़ाई न करने के बाद भी एक्सटर्नल छात्र के रूप में वे फर्स्ट आए.”तपस्वी गया, तप रहाजिस मोदी को वकील साहब गढ़ रहे थे, उन्हें शिखर पर पहुंचते देखना, उनके भाग्य में नहीं था. आठवें दशक की शुरुआत में वे कैंसर से पीड़ित पाए गए. 15 जुलाई 1985 को उनकी मृत्यु हो गई. मोदी भीतर तक हिल गए. दुखी मोदी ने कहा, “तपस्वी गया, तप रहा.”

    अगले कुछ महीने बाद मोदी के जीवन में नया मोड़ आया. नाथभाई सागड़ा गुजरात भाजपा में संगठन मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे थे. खराब स्वास्थ्य के कारण वे परेशानी में थे. वहां ऐसे युवा की जरूरत थी, जो भागदौड़ कर सके. वकील साहब की देखरेख में निखरे मोदी संघ के हर दायित्व के निर्वहन में सफल रहे थे. उन्हें संघ ने भाजपा में भेजने का निर्णय किया. यह निर्णय सर्वोच्च स्तर अर्थात तत्कालीन सरसंघचालक बाला साहब देवरस का था.वो कंधा जिस पर सिर रखकर रो सकेंवकील साहब का मोदी के जीवन पर कितना गहरा प्रभाव रहा है, इसे मोदी ने खुद बयान किया है. किशोर मकवाणा ने अपनी किताब “कॉमनमैन: नरेंद्र मोदी” के लिए मोदी से किए गए साक्षात्कार में पूछा था कि क्या आप प्रार्थना में यकीन करते हैं? मोदी का उत्तर था, हां, निश्चित रूप से.

    प्रार्थना को मैं ईश्वर को स्मरण करने की एक रीति समझता हूं. प्रार्थना असर करती है. उसे तौलने का कोई साधन नहीं होता. लेकिन संकट के समय यदि व्यक्ति समझता है कि आज वो भाई या बहन रहे होते तो बड़ा अच्छा होता.तब मैं मानता हूं कि ‘वे भाई’ ईश्वर हैं, ऐसा समझ लीजिए.” किशोर ने मोदी के जीवन में ऐसे व्यक्ति का नाम जानना चाहा था. मोदी का उत्तर था, “मेरे जीवन में ऐसे तीन व्यक्ति हैं. दो का निधन हो चुका है. मैं उनके नाम बताऊंगा. एक तो वकील साहब थे, जिन पर मैंने किताब भी लिखी. वे अब नहीं रहे. मेरा टीन एज बाद का जीवन, उनके पास चला. इसीलिए वे मेरी सभी बातों से परिचित थे. मेरे सुख-दुःख से भी. उनके बाद दत्तोपंत ठेंगड़ी. लेकिन वे भी अब नहीं रहे. मुझमें कमजोर विचार आते तो उनके सामने व्यक्त करता.मेरा मानना है कि ये लोग मुझे अंदर-बाहर से सभी रूप में जानते थे. हर व्यक्ति के जीवन में कोई ऐसा होना चाहिए. एक कंधा ऐसा होना चाहिए कि जिस पर सिर रखकर हम रो सकें

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