छत्तीसगढ़:–राजधानी रायपुर स्थित धरसीवा ब्लॉक के नगर गांव में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत गरीबों को मिलने वाले राशन में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी सामने आ रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि समिति में फिंगरप्रिंट तो हर महीने लगवा लिया जाता है, लेकिन राशन दो-दो महीने बाद मिलता है, वह भी अधूरा।

ग्रामीणों के अनुसार कभी चावल नहीं मिलता, कभी शक्कर गायब रहती है, तो कभी नमक का ही पता नहीं होता। कई हितग्राहियों का कहना है कि उन्हें महीनों से पूरा राशन मिला ही नहीं। बुजुर्गों और जरूरतमंदों को दो-दो दिन, तीन-तीन दिन,甚至 एक सप्ताह तक समिति का चक्कर लगवाया जाता है और अंत में कहा जाता है — “अभी राशन नहीं आया”।
इस गंभीर अव्यवस्था को लेकर गांव में भारी आक्रोश है। ग्रामीणों ने समिति के विक्रेता और प्रबंधन पर सीधा आरोप लगाते हुए कहा कि भूपेश प्रभाकर द्वारा प्रबंधन ठीक से नहीं किया जा रहा, जिससे गरीब परिवारों को भारी परेशानी झेलनी पड़ रही है।

वहीं समिति के विक्रेता ने अपनी गलती मानने से इनकार करते हुए सारा ठीकरा सरकार पर फोड़ दिया और कहा कि यह समस्या सरकारी सप्लाई से जुड़ी है। लेकिन सवाल यह उठता है कि अगर गलती सरकार की है तो फिंगरप्रिंट पहले क्यों लगवा लिया जाता है? और अगर गलती समिति की है तो कार्रवाई क्यों नहीं होती?
ग्रामीणों का साफ कहना है कि राशन गरीबों का हक है, किसी की मेहरबानी नहीं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर आम जनता का राशन जाता कहां है? और कब तक लापरवाह प्रबंधक व विक्रेताओं पर प्रशासन की गाज नहीं गिरेगी?
अब देखना यह है कि प्रशासन इस गंभीर मामले पर कब संज्ञान लेता है और दोषियों पर ठोस कार्रवाई कर गरीबों को उनका हक दिलाता है या फिर यह व्यवस्था ऐसे ही गरीबों की थाली से निवाला छीनती रहेगी।
