नई दिल्ली:– देशभक्ति को शोर नहीं, एहसास बनाती है ‘इक्कीस’ नए साल के पहले दिन यानी 1 जनवरी 2026 को रिलीज हुई फिल्म ‘इक्कीस’ महज एक वॉर फिल्म नहीं है। यह उस युवा सैनिक की कहानी है, जो देश के लिए जीता है, देश के लिए लड़ता है और देश के लिए अमर हो जाता है। फिल्म युद्ध की भयावहता के साथ-साथ यह सवाल भी उठाती है कि आखिर जंग क्यों होती है और इसकी सबसे बड़ी कीमत कौन चुकाता है?
लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की अमर गाथा:
फिल्म ‘इक्कीस’ भारतीय सेना के वीर अधिकारी लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के जीवन पर आधारित है, जिन्हें बेहद कम उम्र में परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। फिल्म उनके आखिरी मिशन, अदम्य साहस और उस जज्बे को बड़े ही संवेदनशील और सच्चे अंदाज़ में पर्दे पर उतारती है, जिसने उन्हें इतिहास में अमर बना दिया।
अगस्त्य नंदा की दमदार और सच्ची परफॉर्मेंस:
अमिताभ बच्चन के नाती अगस्त्य नंदा ने अरुण खेत्रपाल के किरदार में जान डाल दी है। उन्होंने सिर्फ फौजी वर्दी नहीं पहनी, बल्कि उस डर, जिम्मेदारी और देशभक्ति को भी जिया है।इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण फिल्म की खास स्क्रीनिंग के दौरान अरुण खेत्रपाल के छोटे भाई मुकेश खेत्रपाल का भावुक हो जाना है, जो बताता है कि किरदार कितनी सच्चाई से निभाया गया है।
हर सीन धीरे-धीरे दिल में उतरता है:
फिल्म का ट्रीटमेंट बेहद संयमित है। युद्ध के दृश्य जहां रियल और प्रभावशाली लगते हैं, वहीं फिल्म की असली ताकत उन शांत पलों में है। जब एक जवान अपने परिवार, अपने सपनों और अधूरी जिंदगी के बारे में सोचता है। ‘इक्कीस’ शोर नहीं मचाती, बल्कि भीतर तक असर करती है।
धर्मेंद्र की आखिरी यादगार फिल्म:
फिल्म को और भी भावुक बनाता है धर्मेंद्र का अंतिम अभिनय। भले ही आज वे हमारे बीच मौजूद नहीं हैं, लेकिन पर्दे पर उनकी मौजूदगी आंखों को नम कर देती है। उनका किरदार फिल्म को भावनात्मक गहराई देता है और लंबे समय तक याद रहता है।
क्यों देखनी चाहिए फिल्म ‘इक्कीस’:
अगर आप देशभक्ति को नारे नहीं, एहसास के रूप में देखना चाहते हैं। अगर आप एक सच्चे हीरो की असली कहानी जानना चाहते हैं। अगर आप थिएटर से निकलकर कुछ देर खामोश रह जाना चाहते हैं। ‘इक्कीस’ कोई मसाला फिल्म नहीं है। यह आपको रुलाती है, सोचने पर मजबूर करती है और दिल में कई सवाल छोड़ जाती है। यह उन वीर शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि है, जिन्होंने अपना आज हमारे कल के लिए कुर्बान कर दिया।
