नई दिल्ली:– हर साल 12 जनवरी को भारत ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ के रूप में मनाता है। यह दिन स्वामी विवेकानंद के महान विचारों और उनके अदम्य साहस को समर्पित है, जो आज भी करोड़ों युवाओं के लिए ज्ञान का प्रकाश फैला रहे हैं। लेकिन उनके ‘नरेंद्र’ से ‘विवेकानंद’ बनने के पीछे एक ऐसी कहानी छिपी है, जिसका स्वाद इतिहास के पन्नों में आज भी मीठा है- और वह दिलचस्प कहानी जुड़ी है एक “रौशोगुल्ला” से।
स्वामी विवेकानंद, जिन्हें उनके बचपन में नरेंद्र के नाम से जाना जाता था, खाने-पीने की चीजों को लेकर काफी उत्साहित रहते थे। उन्हें “रौशोगुल्ला” (मिठाई) और आइसक्रीम बेहद पसंद थी, यहाँ तक कि वे कड़कड़ाती ठंड में भी आइसक्रीम खाने का मोह नहीं छोड़ पाते थे। उनके और उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस के बीच पहली मुलाकात की वजह भी यही मिठाई बनी।
कैसे हुई रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात?
दरअसल, विवेकानंद के चचेरे भाई रामचंद्र दत्ता ने उन्हें दक्षिणेश्वर मंदिर चलने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने नरेंद्र को बताया कि वहां रामकृष्ण परमहंस हर आने वाले व्यक्ति को रौशोगुल्ला खिलाते हैं। मिठाई की बात सुनकर नरेंद्र जाने को तैयार तो हुए, लेकिन मजाकिया लहजे में यह भी कह दिया कि “अगर वहां रौशोगुल्ला नहीं मिला, तो वह रामकृष्ण के कान खींच लेंगे।” हालांकि, जब वे वहां पहुंचे, तो उन्हें न केवल मिठाई मिली, बल्कि रामकृष्ण के रूप में एक ऐसा गुरु भी मिला जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी।
आध्यात्मिकता और खान-पान का अनोखा संगम
विवेकानंद के सीनियर्स अक्सर उनकी और रामकृष्ण परमहंस की इस पहली मुलाकात को “मिठाइयों पर आधारित आध्यात्मिकता” कहकर याद करते थे। उनके खान-पान और जीवन से जुड़े इन दिलचस्प पहलुओं का जिक्र ‘स्वामी विवेकानंद: द फ़ीस्टिंग, फ़ास्टिंग मॉन्क’ (Swami Vivekananda: The Feasting, Fasting Monk) नामक पुस्तक में भी मिलता है। समय के साथ गुरु और शिष्य का यह रिश्ता इतना प्रगाढ़ हुआ कि आज विवेकानंद की गुरु भक्ति की मिसाल पूरी दुनिया में दी जाती है।
राष्ट्रीय युवा दिवस का इतिहास और उद्देश्य
भारत सरकार ने साल 1984 में स्वामी विवेकानंद की जयंती को ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की थी। इसके पीछे का मुख्य उद्देश्य यह था कि स्वामीजी के आदर्शवादी दर्शन और सिद्धांतों को देश के युवाओं तक पहुँचाया जाए। औपचारिक रूप से 12 जनवरी 1985 से हर साल यह दिवस मनाया जाने लगा, ताकि युवा उनके जीवन से प्रेरणा लेकर राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे सकें।
नरेंद्र से विवेकानंद: एक प्रेरणादायी जीवन यात्रा
स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में हुआ था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त थे। उनके जीवन में सबसे बड़ा मोड़ 1884 में पिता की मृत्यु के बाद आया, जब परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। मात्र 25 वर्ष की आयु में उन्होंने संन्यास ले लिया और पैदल ही भारत भ्रमण पर निकल पड़े।
उनकी सबसे बड़ी वैश्विक उपलब्धि 1893 में शिकागो (अमेरिका) में आयोजित विश्व धर्म परिषद् थी, जहाँ उन्होंने भारतीय संस्कृति और वेदांत का लोहा मनवाया। उन्होंने मानवता की सेवा के लिए भारत और अमेरिका दोनों जगहों पर रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इस महान विभूति ने 4 जुलाई 1902 को अपनी देह का त्याग किया, लेकिन उनके विचार आज भी अमर हैं।
वर्तमान समय में प्रासंगिकता और युवाओं को संदेश
आज के तकनीकी युग में, जहाँ युवा मानसिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, स्वामीजी के विचार और भी महत्वपूर्ण हो गए हैं। विवेकानंद का मानना था कि युवाओं को राष्ट्र निर्माण के लिए आत्म-विश्वास और साहस का परिचय देना चाहिए। उनका संदेश स्पष्ट था कि मानवता की सेवा ही सर्वोपरि है और दृढ़ इच्छाशक्ति से किसी भी असंभव कार्य को संभव बनाया जा सकता है। देशभर के शिक्षण संस्थानों में आज भी उनके इसी संदेश को याद करते हुए विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
