नई दिल्ली:– श्री प्रेमानंद जी महाराज अपने उपदेशों में बार-बार यह स्पष्ट करते हैं कि जब जीवन में अंधकार छा जाए, अपने-पराए का भेद मिट जाए और लगे कि इस दुनिया में कोई अपना नहीं है, तब केवल एक ही उपाय शेष रहता है भजन। महाराज कहते हैं कि यदि भजन नहीं किया, तो यह बात अपने हृदय या डायरी में लिख लो कि “इस संसार में कोई भी व्यक्ति तुम्हें सच्चा सुख नहीं दे सकता।” वास्तविक शांति और आनंद केवल तब मिलता है, जब विवेक के द्वारा अधर्म का त्याग कर भगवान के नाम का आश्रय लिया जाए।
दुख-सुख एक माया है
महाराज समझाते हैं कि जीवन में आने वाला सुख और दुख केवल माया है। बड़े-बड़े महापुरुषों ने भी अपने जीवन में असहनीय शारीरिक कष्ट झेले हैं। हम सभी भगवान के अंश हैं, लेकिन “अमीर-गरीब”, “स्त्री-पुरुष” जैसी पहचान में उलझकर इस सत्य को भूल जाते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सिखाया कि गर्मी-ठंड, मान-अपमान जैसे अनुभव क्षणिक हैं और इन्हें सहन करना ही धर्म है। प्रभु यह वादा नहीं करते कि वे परिस्थितियां बदल देंगे, बल्कि वे हमें उन्हें सहने की शक्ति देते हैं।
दुख की असली जड़ क्या है?
श्री प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, हमारे सारे दुखों की जड़ हमारा अहंकार और भौतिक आसक्ति है धन, यौवन, पद और शरीर। जब तक हम इन्हें पकड़े रहते हैं, तब तक पीड़ा बनी रहती है। सत्संग और शास्त्रों के अध्ययन से ही इस पीड़ा को छोड़ा जा सकता है।
महाराज “जादू-टूना” और दिखावटी उपायों से सावधान करते हैं। यह संसार “माला-यतन” है, जहां छल और पाखंड भरा है। सच्चा सहारा केवल प्रभु का नाम है जैसे “श्याम श्याम” या राधा राधा”।
कण-कण में विराजमान हैं भगवान
भगवान को पाने के लिए दूर-दूर भटकने की आवश्यकता नहीं। जैसे भगवान महादेव ने कहा, प्रभु हर कण में हैं, ठीक वैसे ही जैसे वैकुंठ में। जब सच्चे प्रेम और अरत भाव से उन्हें पुकारा जाता है, तो वे वहीं प्रकट हो जाते हैं।
श्रीराम का अवतार इसी का प्रमाण है। कौशल्या माता के सामने उन्होंने अपना दिव्य स्वरूप दिखाया, लेकिन मातृत्व के प्रेम में उन्होंने अपनी शक्ति छिपाकर एक रोते हुए शिशु का रूप धारण किया। इससे यह शिक्षा मिलती है कि दीनता सबसे बड़ा गुण है।
महाराज का अंतिम संदेश
यदि आप शाश्वत आनंद और जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति चाहते हैं, तो प्रभु के नाम और चरित्र में डूब जाइए।
- प्रभु की ओर मुख कीजिए: करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
- नाम पर विश्वास रखिए: नाम, प्रभु से भी बड़ा है।
- अहंकार छोड़िए: हम केवल उनके हाथों के साधन हैं।
नाम जप और लीला स्मरण से आपकी दृष्टि बदल जाएगी और जिस शांति को आप बाहर खोज रहे थे, वह आपको अपने भीतर ही, Priya-Pritam के चरणों में मिल जाएगी।
