नई दिल्ली:– ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है और मिडिल ईस्ट में अनिश्चितता का साया गहरा गया है। उनके जाने के बाद ईरान की सड़कों पर गम और गुस्से का मिला-जुला सैलाब उमड़ रहा है, जिससे भविष्य की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो गए हैं। इस घड़ी में जहां ईरान अपने नेता को खोने का दुख मना रहा है, वहीं वैश्विक शक्तियां युद्ध की नई लपटों को उठते हुए देख रही हैं। खामेनेई की विदाई केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं, बल्कि इस पूरे क्षेत्र की राजनीति के एक बड़े अध्याय का समापन है।
ईरान में राष्ट्रीय शोक
ईरान की सरकार ने अपने सुप्रीम लीडर की मौत के बाद देश में 40 दिनों के लंबे राष्ट्रीय शोक और सात दिनों के सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की है। तेहरान की गलियों में सन्नाटा तो है लेकिन लोगों के दिलों में अपने नेता के प्रति अटूट विश्वास और भारी गम साफ तौर पर देखा जा सकता है। लोग बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरकर आंसू बहा रहे हैं और अधिकारियों ने अंतिम संस्कार की तैयारियों को लेकर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं।
अंतिम विदाई की तैयारी
इतिहास गवाह है कि 1989 में खुमैनी के अंतिम संस्कार में करीब एक करोड़ लोग शामिल हुए थे, जो उस समय ईरान की कुल आबादी का छठा हिस्सा था। अब खामेनेई की विदाई के वक्त भी वैसे ही भारी हुजूम के उमड़ने की संभावना जताई जा रही है क्योंकि लोग दूर-दराज के इलाकों से तेहरान पहुंच रहे हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि उन्हें या तो राजधानी तेहरान में या फिर पवित्र धार्मिक शहर मशहद में पूरी राजकीय मर्यादा के साथ दफनाया जा सकता है।
हमले का दुखद पहलू
इजरायल और अमेरिका के इस हमले में केवल खामेनेई ही नहीं बल्कि उनकी 14 महीने की मासूम नातिन समेत परिवार के कई अन्य सदस्यों की भी जान चली गई है। युद्ध की इस क्रूर तस्वीर ने आम लोगों के दिलों में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है और इस घटना को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं भी आ रही हैं। निर्दोष बच्चों की मौत ने इस संघर्ष को और भी अधिक संवेदनशील और भावनात्मक बना दिया है जिससे बदले की आग और भड़क सकती है।
दुनिया भर में विरोध
खामेनेई की मौत की खबर फैलते ही भारत के कश्मीर से लेकर कर्नाटक तक शिया समुदाय के लोगों ने सड़कों पर उतरकर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया है। पाकिस्तान के कई शहरों में तो प्रदर्शन इतने उग्र हो गए कि वहां हिंसक झड़पें और आगजनी की घटनाएं हुईं जिसमें कुछ लोगों के मारे जाने की भी खबर है। इराक की राजधानी बगदाद में भी प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा घेरा तोड़कर अमेरिकी दूतावास की तरफ बढ़ने की कोशिश की जिससे सुरक्षा बलों को बल प्रयोग करना पड़ा।
बढ़ता वैश्विक तनाव
इस घटना के बाद अब हिजबुल्लाह भी युद्ध में पूरी तरह कूद पड़ा है और उसने सीजफायर तोड़कर इजरायली ठिकानों पर रात भर मिसाइलों और ड्रोनों से ताबड़तोड़ हमले किए हैं। ब्रिटेन ने भी अमेरिका का साथ देते हुए ट्रंप की आर्मी को अपने सैन्य बेस इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी है जिससे युद्ध का दायरा बढ़ता जा रहा है। आने वाले समय में मिडिल ईस्ट के समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं क्योंकि अब हर देश अपनी रणनीति को नए सिरे से तैयार करने में जुटा है।
