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    Home » माओवादियों ने घात लगाकर किए थे; इस हमले में 76 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे,अब 16 साल बाद सभी 10 आरोपी क्यों हुए बरी…
    छत्तीसगढ

    माओवादियों ने घात लगाकर किए थे; इस हमले में 76 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे,अब 16 साल बाद सभी 10 आरोपी क्यों हुए बरी…

    By Tv36 HindustanMay 8, 2026No Comments5 Mins Read
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    छत्तीसगढ़:- 6 अप्रैल 2010 की सुबह दंतेवाड़ा जिले के ताड़मेटला गांव के जंगल में नक्सलियों ने घात लगाकर सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (CRPF) की 62वीं बटालियन और स्थानीय पुलिसकर्मी हमला किया. इस हमले में सीआरपीएफ के 75 जवान और एक पुलिसकर्मी शहीद हो गए. अब इस मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सभी 10 आरोपियों को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया है.

    अप्रैल 2010 की सुबह, सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (CRPF) की 62वीं बटालियन और स्थानीय पुलिसकर्मी छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के चिंतलनार के पहाड़ी जंगलों की ओर जा रहे थे. तभी ताड़मेटला गांव के जंगल में नक्सलियों ने उन पर घात लगाकर हमला किया. इस हमले में सीआरपीएफ के 75 जवान और एक पुलिसकर्मी शहीद हो गए. नक्सलियों ने जवानों के हथियार भी लूट लिए और भागने से पहले वहां ‘टिफिन बम’ लगा दिए थे. ताड़मेटला गांव अब सुकमा जिले में आता है और यह घटना CRPF और स्थानीय पुलिस द्वारा चलाए गए चार-दिवसीय संयुक्त अभियान के तीसरे दिन हुई थी.

    अब छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने साल 2010 के ताड़मेटला में हुए हमले में सभी 10 आरोपियों को बरी करने के फैसले को सही ठहराया है. कोर्ट ने अपने फैसले में सीधे सबूतों की कमी, सबूतों के अधूरे होने, जांच प्रक्रिया में हुई चूकों और आरोपियों का दोष ‘तर्कसंगत संदेह से परे’ साबित न हो पाने का हवाला दिया है. कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया है. 10 आरोपियों में से अब तक दो आरोपियों की मौत हो चुकी है. इनमें 19 वर्षीय बारसे लखमा भी शामिल था, जो इस मामले में सबसे कम उम्र का आरोपी था.

    2013 में निचली अदालत ने किया था बरी

    घटना से 3 साल बाद साल 2013 में दंतेवाड़ा की एक सेशन कोर्ट ने आईपीसी की धारा 148 (जानलेवा हथियार से दंगा करना), 120B (आपराधिक साजिश) और 396 (डकैती के साथ हत्या), साथ ही Arms Act की धारा 25 और 27 के अलावा Explosive Substance Act की धारा 3 और 5 के तहत लगाए गए आरोपों से सभी आरोपियों को बरी कर दिया था.

    कोर्ट ने क्यों किया आरोपियों को बरी

    कोर्ट ने कहा कि हालांकि यह घटना ‘बेहद दुखद’ थी, फिर भी अभियोजन एजेंसियाx असली अपराधियों की पहचान साबित नहीं कर पाईं. कोर्ट ने पांच मुख्य बातों पर गौर किया. पहली बात, कोई सीधा सबूत या चश्मदीद गवाह नहीं था और अभियोजन का मामला परिस्थिति के कारण उत्पन्न सबूतों पर आधारित था. दूसरी बात, इकबालिया बयान की पुष्टि किसी स्वतंत्र सबूत से नहीं हुई थी. तीसरी बात, जब्त किए गए विस्फोटक सामान (पाइप बम, ग्रेनेड और राइफलें) घटनास्थल से बरामद किए गए थे, न कि आरोपियों के कब्जे से बरामद हुए थे.

    चौथा बिंदु यह था कि Arms Act के तहत जरूरी अभियोजन मंजूरी का कोई रिकॉर्ड नहीं था और आरोपी की कोई TIP (Test Identification Parade) भी नहीं कराई गई थी. आखिरी बिंदु यह था कि हालांकि पुलिस गवाहों और अधिकारियों के बयानों से यह पुष्टि होती है कि सामग्री जब्त की गई थी, फिर भी वे यह साबित नहीं कर पाते कि आरोपी विस्फोटकों को रखने, संभालने या इस्तेमाल करने में शामिल थे.

    अपने फैसले में कोर्ट ने और क्या-क्या कहा?

    राज्य द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए छ्त्तीसगढ़ के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा, ‘हमें यह देखकर भी उतना ही दुख हुआ कि इतने गंभीर मामले को इस तरह से निपटा गया कि आरोपियों के खिलाफ कोई भी कानूनी रूप से मान्य और विश्वसनीय सबूत पेश नहीं किया जा सका, , जिसमें बड़े पैमाने पर लोगों की जान गई और राष्ट्रीय सुरक्षा पर गंभीर परिणाम हुए. नतीजतन, निचली अदालत को उन्हें बरी करने के लिए मजबूर होना पड़ा.’

    हाई कोर्ट ने आगे कहा,’हालांकि 76 लोगों की जान जाना निस्संदेह एक गहरी त्रासदी और राष्ट्रीय चिंता का विषय है, लेकिन आपराधिक न्यायशास्त्र में यह भी पूरी तरह से स्थापित है कि कोई भी अपीलीय अदालत स्पष्ट, ठोस और कानूनी रूप से मान्य सबूतों के अभाव में किसी को दोषी नहीं ठहरा सकती, जो बिना किसी उचित संदेह के उसका अपराध साबित करते हों.’

    अदालत ने राज्य को आगे निर्देश दिया कि वह यह सुनिश्चित करे कि गंभीर अपराधों की भविष्य की सभी जांच पूरी लगन और कानूनी प्रक्रियाओं का सख्ती से पालन करते हुए की जाएं. विशेष रूप से उन मामलों में इनका ध्यान रखा जाए, जिनमें बड़े पैमाने पर लोगों की जान गई हो या राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो.

    अदालत ने कहा, ‘राज्य को अपने कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम भी लागू करने चाहिए ताकि उनकी जांच करने की क्षमता बढ़ सके और इन निर्देशों का पालन करने के लिए उठाए गए कदमों पर समय-समय पर रिपोर्ट देनी चाहिए. ऐसे उपाय प्रक्रियागत चूकों को रोकने, पीड़ितों को न्याय दिलाने, किसी के निर्दोष होने की धारणा को बनाए रखने और आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं.’

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