मध्यप्रदेश:– खरीफ दौरान सबसे अधिक रकबे में बोई जाने वाली सोयाबीन फसल का साल-दर-साल ग्राफ गिर रहा है। कीट और बीमारियों के प्रकोप से लगातार उत्पादन प्रभावित होने के चलते किसान तीन-चार साल में इससे दूरी बना रहे हैं । इस बार भी सोयाबीन के रकबे में कमी आ सकती है।
सोयाबीन का विकल्प बनी मक्का के बाजार में दाम नहीं मिलने से किसान अब इससे भी तौबा करने का मन बना चुके है,ऐसे में फिर किसान सफेद सोना कहे जाने वाले कपास का रूख करने की संभावना है। वहीं गर्मी के कपास की बाेवनी भी सिंचाई की सुविधा वाले क्षेत्रों शुरू हो गई है।
कृषि विभाग इस वर्ष सोयाबीन के रकबे में पिछले वर्ष की तुलना में छह से सात हजार हैक्टेयर रकबे की वृद्धि मान कर तैयारी कर रहा है। जबकि किसान सोयाबीन का विकल्प खोज रहे है। संभवत: किसान इस बार भी मक्का, कपास और अन्य दलहन फसलों के साथ उद्यानिकी फसलों की ओर रूख कर सकता है।
गतवर्ष भी कई किसानों ने खरीफ प्याज के लिए भूमि खाली छोड़ी। यहां तक कि कई किसानों ने सोयाबीन को खराब होता देख उसी स्थिति में फसल को उखाड़कर प्याज की बुआई की थी।पिछले दो वर्षाें से सोयाबीन में पीला मोजेक और अन्य बीमारियों के प्रकोप से पौधे सूखकर नष्ट हो रहे हैं।
इससे किसानों को लागत भी नहीं निकल पा रही है।वैसे कृषि विभाग भी फसल विविधता पर जोर दे रहा है। इसमें दलहन, तिलहन और अन्य उद्यानिकी फसलों के प्रति जागरुक करने का कार्य कर रहा है।देखा जाए तो गतवर्ष सोयाबीन का रकबा दो लाख 30 हजार से गिरकर एक लाख 88 हजार हैक्टेयर पर आ गया था।वहीं मक्का का रकबा दोगुना बढ़ोतरी के साथ 31 से 70 हजार हैक्टेयर पर चला गया था।
संभावना जताई जा रही है कि इस बार कपास के रकबे में भी छह से सात हजार हैक्टेयर की बढ़ोतरी दर्ज की जा सकती है। साथ ही मक्का का दाम कम मिलने से इसके रकबे में कमी आ सकती है।
खेतों के खराब रास्ते बन रहे मुसीबत
जिले में अधिकांश किसानों के खेताें के रास्ते खराब हैं और खासकर वर्षा दौरान खेतों तक जाना किसी चुनौती से कम नहीं होता है।किसानों ने बताया कि वर्षाकाल दौरान इन रास्तों पर सिर्फ पानी और कीचड़ होता है और वाहन तो दूर पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है।यही कारण है कि किसान सोयाबीन फसल काे चुनना पसंद करते हैं।किसानों की माने तो अन्य फसलों में बार-बार दवाई और खाद के छिड़काव के साथ ही अन्य कार्यों के लिए जाने रास्ता खराब होने से समस्या होती है।
जलस्तर गिरना भी बन रहा रोड़ा
वर्तमान में जिले का जलस्तर अधिक मात्रा में गिर गया है और पानी नहीं होने से वर्तमान में सिंचाई करना संभव नहीं है। किसान का रूझान कपास और मिर्च लगाने में हो तो वह भी संभव नहीं है।क्योंकि मानसून के आने तक बुआई के बाद बीज का अंकुरण और फसल के पौधे को जीवित रखना बड़ी चुनौती है।इसके बाद भी जिन किसानों के पास पानी की उपलब्धता है, वह सोयाबीन को छोड़कर कपास लगा रहे हैं।
कपास और प्याज का बढेगा रकबा
दो वर्षाें से सोयाबीन ने किसानों को सिर्फ रूलाया है और समस्या यह है कि अधिकांश खेतों में सही रास्ते नहीं होने से कोई विकल्प नहीं मिल पाता।इसके बाद भी इस बार कपास और खरीफ के प्याज का रकबा बढेगा और सोयाबीन में कमी आ सकती है।ऐसा भी हो सकता है, किसान एक बार फिर मिश्रण खेती की ओर लौट जाए।- सुभाष पटेल, जिलामंत्री भारतीय किसान संघ
फसल विविधता के लिए कर रहे प्रेरित
गत वर्ष मक्का का रकबा दोगुना हो गया था, लेकिन दाम कम मिलने से किसान मायूस नजर आए।विभाग की ओर से किसानों को फसल विविधता के लिए प्रेरित किया जा रहा है।दलहन, तिलहन और अन्य उद्यानिकी फसलों की ओर रूझान लाने का प्रयास कर रहे हैं।सोयाबीन के रकबे में छह से सात हजार हैक्टेयर की बढ़ोतरी हो सकती है।- नितेश कुमार यादव, उपंचालक कृषि विभाग
कृषि विभाग के अनुसार
06 हजार हैक्टेयर कम हो सकता है मक्का का रकबा
04 हजार हैक्टेयर बढ़ सकता है कपास का रकबा
07 हजार हैक्टेयर बढ़ सकता है सोयाबीन का रकबा
