नई दिल्ली:– भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता देश है। लेकिन देश अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से मंगाता है। इसमें कच्चे तेल के साथ एलपीजी, सीएनजी और एलएनजी गैस भी शामिल हैं। इसमें से 90 प्रतिशत गैस खाड़ी देशों और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते भारत के अलग-अलग बंदरगाहों पर पहुंचता है।
भारत ईरान-अमेरिका युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट पर नाकेबंदी के कारण भारी ऊर्जा संकट का सामना कर रहा है। इसी बीच पुणे की सीएसआईआर-नेशनल केमिकल लैबोरेटरी से एक बड़ी खबर सामने आई। जानकारी के मुताबिक, भारतीय वैज्ञानिक ऐसी देसी तकनीक पर काम कर रहे हैं जिससे आने वाले समय में देश में घरेलू एलपीजी गैस की किल्लत खत्म हो जाएगी। इस तकनीक का नाम डाइमेथाइल ईथर (DME) है। आइए आपको बताते हैं कि यह तकनीक क्या है और ये कैसे भारत में एलपीजी का विकल्प बन सकता है।
एलपीजी का विकल्प कैसे बनेगा डीएमई?
पुणे की सीएसआईआर के वैज्ञानिक डॉ. टी राजा के अनुसार, डीएमई और एलपीजी के उपयोग में कई समानताएं हैं। टी राजा के मुताबिक, डीएमई को भारत में मौजूद संसाधनों जैसे कोयला, बायोमास और मेथनॉल से तैयार किया जा सकता है। अगर यह तकनीक बड़े स्तर पर सफल होता है तो इससे में एलपीजी को लेकर भारत की निर्भकता काफी कम हो सकती है।
उन्होंने बताया कि इसे प्रोपेन और ब्यूटेन के साथ आसानी से मिलाया जा सकता है और घेरलू गैस या इंडस्ट्रियल फ्यूल के रूप में उपयोग में लाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि शुरूआती चरण में 20 प्रतिशत डीएमई और 80 प्रतिशत एलपीजी के मिश्रण को इस्तेमाल करने की योजना है। जिससे लोगों को अपना मौजूदा गैस चूल्हा या सिलेंडर बदलने की जरूरत नहीं होगी।
डीएमई के चला जा सकता है ऑटो रिक्शा
वैज्ञानिकों ने दावा किया कि, डीएमई न केवल रसोई का विकल्प बन सकता है बल्कि इसका इस्तेमाल एलपीजी से चलने वाले ऑटो रिक्शा चलाने के लिए भी किया जा सकता है। यानी सीएसआईआर की यह नई तकनीक न सिर्फ घरेलू गैस की समस्या हो हल कर सकती है साथ ही ट्रांसपोर्ट से जुड़ी परेशानियों को खत्म करने अहम भूमिका निभा सकता है। रिपोर्ट के दावा किया गया है कि अगर भारत घरेलू एलपीजी में 20 प्रतिशत डीएमई ब्लेंडिंग शुरू करता है, तो इससे हर साल करीब 63 लाख टन एलपीजी आयात में कमी लाई जा सकतीहै।
देश को होगा 4.04 अरब डॉलर का मुनाफा
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि, इससे भारत को करीब 4.04 अरब डॉलर यानी लगभग 34,200 करोड़ रूपए की विदेशी मुद्रा बचाने में मदद मिलेगी। वैज्ञानिकों की यह खोज ऐसे समय में सामने आई है जब सरकार विदेशी मुद्रा के खर्च को कम करने के लिए अलग-अलग उपाय कर रही है। साथ ही एलपीजी को लेकर भारत समेत पुरी दुनिया पर भारी दबाव बना हुआ है।
कैसे बनाई जाती है डीएमई?
डीएमई बनाने की प्रक्रिया बेहद खास है। इसे कोल गैसीफिकेशन तकनीक के जरिए कोयले को सिंथेटिक गैस में बदला जाता है। आगे चलकर इसी सिंथेटिक गैस को डीएमई में परिवर्तित किया जाता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, डीएमई जलने पर पारंपरिक हाइड्रोकार्बन ईंधन की तुलना में कम प्रदूषण फैलाता है। इस लिए सरकार इसे क्लीन फ्यूल विकल्प के तौर पर भी देख रही है।
ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) पहले ही भारत में 20 प्रतिशत DME-LPG ब्लेंडिंग को अपनी मंजूरी दे चुका है। हालांकि, भारत में फिलहाल यह प्रोजेक्ट अपने शुरुआती चरण में है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर साफ नीति और निवेश मिले तो इस सेक्टर में जल्द ही बड़ी कामयाबी मिल सकती है।
डीएमई उत्पादन में चीन सबसे आगे
डीएमई उत्पादन में चीन दुनिया में सबसे आगे है और वो वैश्विक क्षमता का करीब 90 प्रतिशत अकेले उत्पादन करता है। ऐसे में भारत इस तकनीक के जरिए देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता को बढ़ाने में दिशा में बड़ा कदम उठाने की कोशिश कर रहा है। पुणे की लैब में काम कर रहे वैज्ञानिकों का मानना है कि ह सिर्फ रिसर्च प्रोजेक्ट नहीं बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा मिशन है। जो आने वाले समय में देश की दशा और दिशा सुधारने में अहम भूमिका निभा सकता है।
