नई दिल्ली:– ट्रम्प ईरान डील ने दुनिया के कूटनीतिक गलियारों और मीडिया में बहुत बड़ी बहस छेड़ दी है। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर ऐलान किया कि ईरान के साथ डील पूरी हो चुकी है और सबको बधाई भी दे दी। इस बड़े ऐलान के बाद दुनिया भर में यह सवाल उठने लगा है कि क्या यह कोई नया परमाणु समझौता है या फिर ऐतिहासिक शांति समझौता। फिलहाल अमेरिका, ईरान और बाकी देशों की तरफ से इस समझौते को लेकर अलग-अलग तरह के अजीब संकेत मिल रहे हैं।
अमेरिकी मीडिया ने इस समझौते को कई अलग नाम दिए हैं और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने इसे महत्वपूर्ण पीस डील बताया है। हालांकि वास्तव में अमेरिका और ईरान के अधिकारी आधिकारिक तौर पर इसे सिर्फ एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग यानी एमओयू कह रहे हैं। कतर के प्रधानमंत्री और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी अपने बयान में इसे डील के बजाय मात्र एक एमओयू ही कहा है। ट्रंप के इसे डील कहने से पूरी दुनिया में यह संदेश गया कि उन्होंने एक बहुत बड़ी कूटनीतिक सफलता हासिल कर ली है।
ट्रंप का डीलमेकर अंदाज और कूटनीति
विशेषज्ञों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में डील कोई औपचारिक शब्द नहीं है, बल्कि हमेशा एग्रीमेंट, फ्रेमवर्क या एमओयू का इस्तेमाल होता है। लेकिन ट्रंप लंबे समय से खुद को एक बहुत बड़े डीलमेकर के रूप में पेश करते हैं और उनकी किताब भी इसी पर है। इसलिए ट्रंप ने अपनी राजनीतिक सफलता दिखाने के लिए इस समझौते को सीधे एक शानदार डील का नाम देकर दुनिया को चौंका दिया।
समझौते के बीच सैन्य कार्रवाई की चेतावनी
ट्रंप ने पहले डील पूरी होने की बात कही और बताया कि शुक्रवार को हस्ताक्षर के बाद होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह खोला जाएगा। लेकिन जी-7 सम्मेलन में उन्होंने खुद इसे एमओयू बताया और ईरान को सख्त सैन्य कार्रवाई की भयानक चेतावनी भी दे दी। इससे यह बड़ा सवाल उठा कि अगर यह वास्तव में एक शांति समझौता है तो फिर अचानक सैन्य कार्रवाई की बात क्यों हो रही है।
अगले 60 दिनों में होगा फाइनल फैसला
यूरेनियम भंडार, निरीक्षण व्यवस्था और परमाणु कार्यक्रम जैसे कई अहम मुद्दों पर अभी भी दोनों देशों के बीच काफी मतभेद बने हुए हैं। अमेरिका और ईरान इन सभी संवेदनशील मुद्दों पर अगले 60 दिनों में आगे की अहम चर्चा करेंगे और बाकी चीजों को फाइनल करेंगे। इस बीच समझौते के तहत ईरान का खतरनाक एनरिच्ड यूरेनियम पूरी तरह से जमीन के भीतर ही सुरक्षित और दबा हुआ रखा जाएगा।
कूटनीतिक अस्पष्टता या फिर कोई सोची-समझी चाल
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की अस्पष्ट भाषा जानबूझकर इस्तेमाल की जाती है ताकि राजनीतिक दबाव आसानी से संभाला जा सके। आलोचकों का साफ आरोप है कि ट्रंप डील शब्द का इस्तेमाल करके अपना कूटनीतिक दबदबा और राजनीतिक ताकत दुनिया को दिखाना चाहते हैं। फिलहाल इसे अंतिम शांति समझौता या पूर्ण न्यूक्लियर डील कहना बहुत जल्दबाजी होगी क्योंकि जमीन पर कई अहम मुद्दे अब भी अनसुलझे हैं।
