छत्तीसगढ़:– एक उम्दा शिक्षा प्राप्त, महत्वाकांक्षी महिला और एक युवक की मुलाकात रायपुर के IIM कैंपस में हुई। 2019 में MBA की पढ़ाई के दौरान शुरू हुई दोस्ती धीरे-धीरे गहरे रिश्ते में बदल गई। दोनों ने साथ रहना शुरू कर दिया। लगभग दो साल तक चला यह लिव-इन सफर, जिसमें दोनों ने एक-दूसरे के साथ शारीरिक संबंध भी बनाए। सबकुछ आपसी सहमति से, खुशी-खुशी।
लेकिन जैसे ही रिश्ते में टेंशन आया, कहानी बदली। महिला ने आरोप लगाया कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। बाद में उम्र, जाति और धर्म का हवाला देकर शादी से इनकार कर दिया। महिला ने 28 नवंबर 2021 की एक घटना में अप्राकृतिक कृत्य (Section 377) का भी आरोप लगाया। केस दर्ज हुआ। धारा 376(2)(k)(n) और 377 के तहत मुकदमा चला।
ट्रायल कोर्ट ने सबूतों, दोनों के आचरण और लंबे समय तक चले रिश्ते को देखते हुए युवक को पूर्ण रूप से बरी कर दिया। महिला ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।
29 जून 2026 को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा:
“जब दो बालिग व्यक्ति लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हैं, तो कानून यह presumption करता है कि उनके बीच के शारीरिक संबंध आपसी सहमति से ही बने थे। दोनों पक्ष रिश्ते के परिणामों से अच्छी तरह वाकिफ थे। केवल बाद में शादी से इनकार करना दुष्कर्म नहीं बनता।”
कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसे मामलों में “किताबी नजरिया” अपनाना गलत है। महिला की अपील ACQA No. 380 of 2025 खारिज कर दी गई। ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार।
यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?
यह लिव-इन रिलेशनशिप में वयस्कों की सहमति को मजबूती देता है और झूठे या बदले की भावना वाले मुकदमों पर लगाम लगाता है। साथ ही यह याद दिलाता है कि लंबे रिश्तों में भावनात्मक टकराव को हमेशा आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता।
