नई दिल्ली:– देश में शिक्षा लगातार महंगी होती जा रही है, लेकिन इसके बावजूद युवाओं के लिए नौकरी की गारंटी नहीं है। हाल ही में शिक्षा व्यवस्था और रोजगार को लेकर उठे सवालों के बीच सामने आई विभिन्न रिपोर्टों ने इस गंभीर स्थिति की तस्वीर साफ कर दी है। छात्र आंदोलनों, पेपर लीक विवाद और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद अब बहस इस बात पर है कि क्या देश की शिक्षा व्यवस्था युवाओं को रोजगार देने में सक्षम है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) में शिक्षा पर GDP का 6% खर्च करने का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन फिलहाल भारत में शिक्षा पर सरकारी खर्च करीब 4% ही है। इसका असर यह है कि लाखों परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई पर निजी खर्च करने को मजबूर हैं।
सरकारी सर्वे के अनुसार, सरकारी स्कूल में एक छात्र पर सालाना औसतन 2,863 रुपये खर्च होते हैं, जबकि निजी स्कूल में यही खर्च बढ़कर 25,002 रुपये तक पहुंच जाता है। यानी प्राइवेट स्कूल की पढ़ाई सरकारी स्कूल की तुलना में लगभग 9 गुना महंगी है। वहीं, मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसी प्रोफेशनल डिग्री के लिए हर साल लाखों रुपये खर्च करने पड़ते हैं।
World Bank की रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण एशिया में भारतीय परिवार अपने बच्चों की शिक्षा पर श्रीलंका की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक खर्च करते हैं। इसके बावजूद रोजगार की स्थिति संतोषजनक नहीं है।
India Skills Report 2026 के अनुसार, देश में रोजगार क्षमता (Employability) 56.35% है। यानी यदि 100 छात्र पढ़ाई पूरी करते हैं तो केवल 56 को ही नौकरी मिलने की संभावना होती है, जबकि बाकी 44 को रोजगार नहीं मिल पाता। सबसे अधिक रोजगार क्षमता MBA और इंजीनियरिंग डिग्री धारकों में देखी गई है, जबकि ITI और पॉलिटेक्निक छात्रों की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर है।
State of Working India 2026 रिपोर्ट बताती है कि 15 से 29 वर्ष के ग्रेजुएट युवाओं में बेरोजगारी सबसे अधिक है। 20 से 29 वर्ष के करीब 6.3 करोड़ ग्रेजुएट युवाओं में से लगभग 1.1 करोड़ बेरोजगार हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि नौकरी पाने वाले युवाओं में भी केवल 6.7% को स्थायी वेतन वाली नौकरी और 3.7% को व्हाइट-कॉलर जॉब मिलती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, पढ़े-लिखे युवाओं में बेरोजगारी अधिक दिखने के दो प्रमुख कारण हैं—पहला, बेहतर नौकरी की तलाश में लंबे समय तक इंतजार करना या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना, और दूसरा, यही वर्ग सबसे अधिक सक्रिय रूप से नौकरी की तलाश करता है, इसलिए बेरोजगारी के आंकड़ों में इनकी संख्या अधिक दिखाई देती है।
देश में शिक्षा पर बढ़ता खर्च और रोजगार के सीमित अवसर अब नीति निर्माताओं के सामने बड़ी चुनौती बन चुके हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल डिग्री नहीं, बल्कि कौशल आधारित शिक्षा और उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप प्रशिक्षण पर जोर देना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
