नई दिल्ली:– देश में NEET जैसी परीक्षाओं की पारदर्शिता को लेकर उठे सवालों और झारखंड में JPSC-JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ छात्रों के आंदोलनों के बीच अब छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से भी शिक्षा एवं प्रवेश प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर बड़ा मामला सामने आया है। डी.पी. विप्रा लॉ कॉलेज की B.A. LL.B. प्रथम सेमेस्टर (सत्र 2026-27) की मेरिट सूची पर एक अभ्यर्थी ने गंभीर सवाल खड़े करते हुए जांच की मांग की है।
मामला तब गंभीर हो जाता है जब शिकायतकर्ता के अनुसार उसके 58.80 प्रतिशत अंक होने के बावजूद उसे सामान्य वर्ग की मेरिट सूची में स्थान नहीं मिला, जबकि उससे कम अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों के नाम चयन सूची में शामिल बताए गए हैं।
शिकायत में HOD संतोष ठाकुर की भूमिका पर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ता के भाई के साथ कथित दूरभाष बातचीत का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि चयन प्रक्रिया में “गलती” होने की बात कही गई। इतना ही नहीं, शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ अभ्यर्थियों के चयन के संबंध में जनप्रतिनिधियों, मंत्रियों और विधायकों की कथित अनुशंसा का हवाला दिया गया।
यदि शिकायत में लगाए गए आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो यह महज मेरिट सूची की तकनीकी गलती नहीं, बल्कि प्रवेश प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़ा करने वाला मामला होगा।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि 58.80 प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाला सामान्य वर्ग का अभ्यर्थी मेरिट से बाहर और उससे कम अंक वाले अभ्यर्थी चयन सूची में कैसे पहुंचे? कॉलेज प्रबंधन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि मेरिट तैयार करने के लिए कौन-से नियम और मापदंड अपनाए गए थे।
वहीं, राजनीतिक अनुशंसा के कथित आरोपों ने मामले को और संवेदनशील बना दिया है। यदि किसी राजनीतिक व्यक्ति की अनुशंसा के आधार पर मेरिट प्रभावित की गई है तो यह अत्यंत गंभीर विषय होगा। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है और संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष सामने आना भी आवश्यक है।
अब जांच से खुलेगा मेरिट सूची का सच
अभ्यर्थी ने प्राचार्य से मेरिट निर्धारण की पुनः जांच, चयन न होने का लिखित कारण, चयन प्रक्रिया का आधार सार्वजनिक करने तथा गड़बड़ी पाए जाने पर संशोधित मेरिट सूची जारी करने की मांग की है।
अब सवाल कॉलेज प्रबंधन से है—क्या मेरिट सूची वास्तव में नियमों के अनुसार बनी है? अगर हां, तो 58.80 प्रतिशत वाले अभ्यर्थी को बाहर रखने और उससे कम अंक वालों को चयनित करने का आधार क्या है?
मामले की निष्पक्ष जांच और दस्तावेजों के सार्वजनिक होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि यह महज प्रशासनिक त्रुटि थी या प्रवेश प्रक्रिया में वास्तव में कोई गंभीर अनियमितता हुई।
बिलासपुर के इस मेरिट विवाद ने कॉलेज प्रशासन के सामने पारदर्शिता की अग्निपरीक्षा खड़ी कर दी है।
