नई दिल्ली:- रंग-बिरंगी साड़ियां, माथे पर सिंदूर की बिंदी और गरबा करते पुरुषों का समूह। गुजरात के अहमदाबाद में नवरात्रि की आठवीं रात ऐसा ही दृश्य देखने को मिलता है। शाहपुर इलाके की साडू माता नी पोल में बारोट समुदाय के पुरुष हर साल इस विशेष परंपरा को निभाते हैं। स्थानीय लोग इसे करीब 200 साल पुरानी साडू माता की स्मृति और प्रायश्चित की लोककथा से जोड़ते हैं।
पीढ़ियों से निभाई जा रही अनोखी रस्म
साडू माता के सम्मान में होने वाले इस गरबा में पुरुष साड़ी पहनकर शामिल होते हैं और परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना करते हैं। रविवार को हुए आयोजन में भी कम से कम 40 पुरुषों ने हिस्सा लिया। बारोट समुदाय के साथ दूसरे समुदायों के लोग भी इस परंपरा में शामिल हुए।
60 वर्षीय सतीश बारोट चार दशक से अधिक समय से इस रस्म का हिस्सा बन रहे हैं। वहीं, सुरेंद्रनगर से पिंटू बारोट अपने परिवार के साथ पहुंचे। उनके 10 वर्षीय बेटे, भाई और भतीजे ने पहली बार इस गरबा में भाग लिया। इस तरह बुजुर्गों के साथ नई पीढ़ी भी परंपरा को आगे बढ़ा रही है।
साडू माता की स्मृति से कैसे जुड़ी परंपरा?
स्थानीय लोगों में प्रचलित कथा के अनुसार, लगभग दो सदियों पहले तत्कालीन शासक ने बारोट समुदाय की साडू माता को दरबार में लाने का आदेश दिया था। उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें ले जाने पहुंचे सैनिकों का समुदाय के लोगों ने विरोध किया।
कथा में बताया जाता है कि इस टकराव के दौरान साडू माता और उनकी बेटी की दुखद मृत्यु हुई। इसके बाद समुदाय में इस बात का गहरा पछतावा रहा कि वे उनकी रक्षा नहीं कर सके। साडू माता की स्मृति में स्थापित स्थान पर लोग एकत्र होने लगे और क्षमा तथा परिवारों की भलाई के लिए प्रार्थना करने लगे। यह विवरण स्थानीय मौखिक परंपरा पर आधारित है।
प्रायश्चित और कृतज्ञता का प्रतीक बना गरबा
लोकविश्वास के मुताबिक, उस घटना के बाद समुदाय के कुछ परिवारों में हुई विपत्तियों को श्राप से जोड़कर देखा गया। इसी विश्वास के चलते पुरुषों ने साडू माता से जुड़े वस्त्र धारण करके प्रायश्चित करने का संकल्प लिया। समय के साथ नवरात्रि की आठवीं रात साड़ी पहनकर गरबा करने की रस्म स्थापित हो गई।
आयोजन में शामिल लोगों के लिए यह परंपरा आस्था, कृतज्ञता और अपने समुदाय की स्मृतियों से जुड़ने का माध्यम है। वे हर साल साडू माता के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं और आने वाली पीढ़ियों की सुख-शांति की कामना करते हैं। श्राप और उससे मुक्ति की कहानी इस परंपरा से जुड़ी लोकमान्यता है।
