
नई दिल्ली : दुनिया में कई पकार की जातियां पाई जाती है। जिनका जीवन जीने का तरिका खान-पान और बाकी चीजें आम आदमी से अलग होती है। जो हर किसी को हैरान कर देती है। ऐसी ही एक जनजाति इंडोनेशिया के गोरोन्तालो के माउंटेन में गहरे और घने जंगलों में रहती है, जो आज भी लून के लिए रहस्य बनी हुई है। इस जनजाति में भाई-बहन, मां-बेटोंऔर पिता-बेटियों के साथ संबंध बनाता है। हम जिस जनजाति की बात कर रहे हैं उसका नाम ‘पोलाही’ है।
बाहरी दुनिया से कोसों दूर होते है पोलाही जनजाति के लोग
इंडोनेशिया में जिन जनजातियों को आदिम यानी प्राचीन माना जाता है पोलाही जनजाति उनसे भी काफी पीछे है। कह सकते हैं कि मौजूदा बाहरी दुनिया से कोसों दूर। मतलब दूसरी अन्य आदिम जनजातियां अब जंगलों से निकलकर कुछ हद तक बाहरी जीवन में घुलने-मिलने लगी हैं, लेकिन पोलाही अभी भी इनसे दूर है।
इंडोनिशिया के गोरोन्तालो प्रांत की राजधानी और एक सिटी है गोरोन्तालो। पोलाही जनजाति यही के अंदरुनी जंगलों में निवास करती है। इनमें भाई-बहन, मां-बेटोंऔर पिता-बेटियों के साथ भी फिजिकल रिलेशन बनते हैं। यानी ये लोग इनब्रीडिंग ट्रेडिशन को निभाते आ रहे हैं। मतलब ये लोग रक्त-संबंधियों से भी शादी करने को स्वतंत्र होते हैं। इनके बीच यह मैरिज सिस्टम डच औपनिवेशिक काल से चला आ रहा है।
पत्तों पर भरोसा करते हैं पोलाही
पोलाही जनजाति ने लाइफस्टाइल में बदलाव (घुमंतू) को एक जंगल से दूसरे जंगल में बदल दिया है। यानी वे सिर्फ एक जंगल से निकलकर दूसरे जंगल में शिफ्ट ही हुए हैं। वे अभी भी कपड़ों से फैमिलियर नही हैं। उन्हें नहीं पता कि कपड़े कैसे पहनते हैं? उनका कोई धर्म भी नहीं हैं। पोलाही अपना पूरा जीवन-हर दिन, हर समय जंगल में बिताते हैं। केवल एक छोटी घास-फूस की एक टेम्परेरी झोपड़ी में समय गुजारते हैं। जिसमें दीवारों और दरवाजों जैसा कुछ नहीं होता। पोलाही दीवारों के बिना पत्तों पर भरोसा करते हैं।
जंगली जानवरों का करते हैं शिकार
अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए पोलाही जनजाति आमतौर पर जंगली सूअर, हिरण और सांप का शिकार करते हैं। इसके अलावा वे प्रतिदिन भोजन पत्तियों, कंदों और जड़ वाली फसलों का भी सेवन करते हैं। अगर उन्हे कुछ पकाना होता है, तो बांस की डंडियों को कंटेनर की तरह इस्तेमाल करते हैं। इनका भोजन बिना किसी मसालों के 100% ऑरिनल होता है। यानी भोजन में हल्दी, धनिया, मिर्च, जीरा, लौंग, इलायची, काली मिर्च, नमक आदि का इस्तेमाल नहीं करते। वजह, ये लोग मसालों से परिचित नहीं हैं। इनके खाने पकाने की तौर-तरीका भी बेहद सरल है। ये चिमनी यानी जहां आग जलाई है, उसके ऊपर बांस की छड़ों पर सारी चीजें, जिन्हें पकाना हैं, रख देते हैं। जब आग से जलकर बांस टूट जाता है, तब ये मानकर चलते है कि भोजन पक गया।
पोलाही के बारे में एक अन्य बात और दिलचस्प है कि इनकी ड्रेस कैसे तैयार होती है? जैसा कि हम जानते हैं कि इंडोनेशिया के सबसे पूर्वी प्रांत पापुआ में कुछ जनजातियां कोटेका को नग्नता कवर करने के लिए उपयोग करती हैं। तो पोलाही जनजाति अपने लंगोट के रूप में लकड़ी की बड़े पत्तों को रस्सी से बांधकर उपयोग करती हैं। महिलाएं भी इसी तरह के लंगोट पहनती हैं। पोलाही महिलाएं ब्रेस्टप्लेट यानी ब्रा से फैमिलियर नहीं हैं। इसलिए ये महिलाएं अर्धनग्न हैं। आपको बता दें कि कोटेका को होराम या लिंक गार्ड कहते हैं। इसे लिंग म्यान भी कहते हैं, जिसे पुरुष अपने लिंग को ढंकने के लिए पहनते हैं।