
रिपोर्ट: शशिभूषण सोनी चांपा जंजीर
अक्षय तृतीया जिसे छत्तीसगढ़ में लोग अक्ति 'अक्तिजिया' के नाम से भी जानते हैं । वास्तव में अक्षय का अर्थ होता हैं जिसका कभी क्षय ना हो रहें अनंत ! अर्थात इस दिन जो भी संस्कार किए जायेंगे वे अखंड रहेंगे और उनका प्रतिफल मंगलकारी भी होगा। चिरस्थाई हिंदू धर्म में शुभ कार्य देखकर ही किया जाता हैं लेकिन अक्षय तृतीया एक ऐसा मुहुर्त हैं जो सभी मांगलिक कार्यों के लिए सर्वाधिक श्रेष्ठ सिद्ध माना गया हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन कोइ भी शुभ कार्य किया जाए फलदाई होता हैं । हर धर्म की मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए इस दिन हिंदू धर्म में अनेकों विवाह होते हैं,लोग सोना-चांदी , गाड़ी आदि वस्तुओं को इस दिन क्रय करने शुभ मानते हैं ।
सदियों पहले जब छत्तीसगढ़ अंचल में स्कूली शिक्षा नहीं दी जाती थी तब बुजुर्गों का मानना था कि एक दिन लड़कियों को ससुराल जाना हैं और घरगृहस्थी संभालनी हैं।इस सोच के तहत विवाह के दौरान लड़कियों को विभिन्न रस्मों की जानकारी दी जाती हैं । इस दिन गुड्डे व गुड़ियों का विवाह कराने का पारंपरिक रिवाज रहा हैं ।आज उसी को लेकर मै अपना अनुभव आप लोगो से साझा कर रही हूं ••••••••••
हम-सब सहेलियां अक्षय तृतीया का बेसव्री से इंतजार करती थी हो भी क्यों ना , इस दिन हम मुहल्लें के बच्चें धूमधाम से अपने गुड्डे -गुडियों का विवाह करवाते थे । एक सप्ताह पहले से ही तैयारियां शुरु हो जाती थी दो-परिवार की तरह हम दो भागों में बंट जाते थे । एक पक्ष लड़का दुसरा पक्ष लड़की ! दोनों पक्षों की टोलियो में , बंटे हुए बच्चें मुहल्ले में घूम-घूम कर सबसे चंदा इकट्ठा करते थे , चंदे में हमें कही , 25 पैसा , कही 50 पैसा तो कही एक रुपया से ज्यादा नही मिलता उतने रुपयो से ही हमे व्यवस्था करनी पडती थी । हम बच्चें भी अपने गुल्लक में बचाकर रखे हुए सिक्को को इस दिन खर्च किया करते थे अभाव में भी हम सब व्यवस्था हंसी-ख़ुशी कर ही लेते थे ।
अक्षय तृतीया के दो-दिन पहले दो मंडप सजता था एक लडके के लिए और एक लडकी के लिए ।दोनो पक्ष के लोग चूल-माटी , देवतल्ला , हरदियाही आदि सभी कार्यक्रमों को मज़े लेकर करते थे। हमारे इन कार्यो को संपन्र करवाने में बडे-बुर्जुगो का भी सहयोग रहता था । मुहल्लें में पूरे उत्साह व खुशी का माहौल रहता था ।

अक्षय तृतीया के दिन शाम को धूमधाम से दूल्हे ( गुड्डे) की बारात निकलती थी । लडके पक्ष वाले बाराती बन कर नाचते-गाते लड़की ( गुड्डी)के घर तक आते थे बाजा के रुप में थाली-टिपा मंजीरा को जोर-जोर से बजा कर उस धुन में उटपुटांग बे सैर पिर के नाचते हुए आते थे और पूरे मुहल्लें वासियों को एहसास करवाते थे कि बारात निकल गई हैं । लडकी वालो के घर बारातियो का स्वागत-सत्कार उत्साह और उमंग से करते थे । इस दौरान चाय- नाश्तें के साथ रात में खाना की व्यवस्था रखते थे । नाश्ते में मिक्चर-बिस्किट ,खाने में दाल, चांवल, पूड़ी बड़ा, सब्जी के साथ मिठान्न के रुप में बूदी के लड्डू, हलवा या सेवई भी होता था । विवाह के समय मंडप के नीचे कन्यादान के समय मुहल्ले की महिलाएं जिनमें माताएं , चाचीयां , भाभीयां आदि थी दूल्हन को दहेज़ देती थी । दहेज़ मे मिलें हुए रुपयों को हम बाद में पूरी व्यवस्था मे हुए खर्च में शामिल कर लेते थे । नाश्ता-खाना सब मिलकर उत्साह से बनाते थे । जैसे भी बनता था,उसकी खूशबू वैसे भी स्वादिष्ट और मनभावन लगती थी वास्तव में उस दौर का मज़ा ही कुछ और था ।
वर्तमान समय में बच्चें ना तो अक्ति को जानते हैं , ना गुड्डे-गुड्डियों के विवाह को दोष उन बच्चो का भी नही हैं। समय व परिस्थितियों का हैं । वर्तमान परिवेश में पहले जैसे लोग एक दूसरो पर विश्वास नही करते हैं और न ही इन कामो के लिए उनके पास समय रहता हैं ।विश्वास न करने का कारण आज की अपराधिक मनोवृत्तियां और समय ना दे पाने का कारण व्यस्त दिनचर्या , व्यस्त जीवन । बच्चों को मोबाईल तक ही सीमित न रख उनको अपनी सभ्यता संस्कृति के विषय में न कोई जानकारी होती हैं और न ही वो जानना चाहते हैं ।
हम लोगो का समय बीच का समय हैं , हमने पुरानी जिंदगी को देखा व जिया, आज के परिवेश की जिंदगी को देख रहे हैं और जी रहे हैं । दोनों अपनी जगह सही हैं लेकिन जहां तक मेरा विचार हैं कि पुरानी जिंदगी ही बेहतर जिंदगी थी उस समय अभाव मे ही सुख था , लोगो का अपनापन ,प्रेम,रिश्ता निभाने की कला, पडोसी का , पूरे मुहल्ले का एक दूसरे के प्रति सहयोगी भावना आज धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रही हैं ।
अक्ति के दिन गुड्डें-गुड्डियो का विवाह करना महज एक खिलौना खेलना नही था । इसी बहाने बच्चें इस उम्र से ही सामाजिकता निभाना सीख जाते थे ।प्रथाओं परंपराओ को अपने जीवन में उतारने की कला सिख जाते थे ।जिम्मेदारी निभाना सिखकर घर परिवार वालो के साथ पडोसियो से मेल मिलाप करना सिखते थे ।
परिवर्तन प्रकृति का नियम हैं,परिवर्तित होते समाज के साथ अपने आप को ढालना ही समझदारी है ,लेकिन बिते हुए दिनो को भूल पाना भी आसान नही होता हैं ।