नई दिल्ली:– ईरान के साथ युद्ध से निकलने की कोशिश में जुटे अमेरिका ने फिर से भारत के साथ मित्रता की दुहाई देनी शुरू की है। अमेरिका भारत के साथ उसी तरह के मजबूत रिश्ते चाहता है, जैसा कि डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल की शुरुआत में था।
मिडिल ईस्ट युद्ध में अमेरिका बुरी तरह से फंस चुका है। उसे इससे बाहर निकलने का रास्ता नहीं दिख रहा। इसी दौरान अमेरिका को भारत और उसके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की याद आने लगी है।
भारत में अमेरिकी दूतावास ने एक्स पर डोनाल्ड ट्रंप के एक साल से भी ज्यादा पुराने एक बयान को पोस्ट करके भारत और अमेरिकी साझेदारी का गुणगान किया है। भारत में अमेरिकी दूतावास ने ट्रंप के 13 फरवरी, 2025 के बयान और उनके और पीएम मोदी के ज्वाइंट प्रेस कांफ्रेंस की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा है-
अमेरिका को क्यों आई भारत की दोस्ती याद
एक दिन पहले भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने अमेरिका जाकर दोनों देशों के रिश्तों की घनिष्ठता की दुहाई दी थी। फिर गुरुवार को अमेरिकी दूतावास को भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों की ऊंचाइयों वाले दिन याद आ रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि,
क्या डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ युद्ध से सम्मानजनक तरीके से बाहर निकलने के लिए भारत और खासकर पीएम मोदी से किसी तरह की मध्यस्थता की उम्मीद तो नहीं कर रहे हैं?
क्योंकि जब पश्चिम एशिया में लड़ाई उनकी उम्मीद से काफी लंबी खिंच गई तब जाकर उन्होंने पहली बार पीएम मोदी को फोन मिलाया।
उसी दौरान पाकिस्तान को बातचीत के लिए लगाया, लेकिन उसपर भरोसा करने के लिए कोई पक्ष तैयार नहीं था। भारतीय विदेश मंत्री ने संसद में पाकिस्तानी रोल को ‘दलाली’बताया, जो कि उसका चरित्र जाहिर करता है।
भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जिसके अमेरिका और ईरान के साथ-साथ इजरायल, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ भी अच्छे संबंध हैं।
मुझे यह कहते हुए खुशी है कि आज की घोषणाओं के साथ अमेरिका और भारत के बीच की मित्रता, मुझे लगता है कि अबतक में सबसे ज्यादा मजबूत हुई है। मेरे हिसाब से हमारा संबंध दोनों राष्ट्रों के दो नेताओं के बीच में अब तक का सबसे अच्छा संबंध है और मेरे लिए यह कहना सम्मान की बात है।
भारत के साथ रिश्ता कैसे बिगड़ा
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान युद्ध रुकवाने का ट्रंप के दावे को जबसे भारत ने खारिज किया, तभी से उन्होंने भारत से खुन्नस पाल लिया।
भारत की मित्रता को ताक पर रखकर उन्होंने पाकिस्तानी फौज के चीफ जनरल असीम मुनीर की व्हाइट हाउस में मेजबानी की।
ट्रंप ने यहां तक कोशिश की कि उसी दौरान पीएम मोदी को भी व्हाइट हाउस बुला लें और दोनों के बीच युद्ध रुकवाने के अपने दावे पर मुहर लगवा लें।
लेकिन, लगता है कि पीएम मोदी उनके इरादे को भांप गए और उनकी चाल में फंसने से बच गए।
ट्रंप यह भी चाहते थे कि युद्ध रुकवाने के उनके दावे का भारत न सिर्फ समर्थन करे, बल्कि नोबेल शांति पुरस्कार दिलाने की भी पैरवी करे, जैसा कि पाकिस्तान ने निर्लज्जता के साथ किया भी।
इसी के बाद ट्रंप ने रूस से कच्चा तेल खरीदने के नाम पर भारत पर सबसे ज्यादा 50% टैरिफ लगाकर दबाव बनाना शुरू किया।
ट्रंप को इसके लिए अमेरिका में भी भारी विरोध का सामना करना पड़ा।
आखिरकार अमेरिकी न्यायपालिका में ही ट्रंप की टैरिफ नीति की किरकिरी हो गई और वह इसे बहुत ज्यादा कम करने को मजबूर हो गए
इसके बाद भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील ने थोड़ी रफ्तार पकड़ी ही थी कि उन्होंने इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर धावा बोल दिया।
