नई दिल्ली :- पहले के समय में पुरुष और महिलाएं अपने निचले शरीर में छोटा कपड़ा लपेटा करते थे, जिसे धोती कहा जाता है। आप को बता दें कि साड़ी शब्द संस्कृत के ‘सट्टिका शब्द से निकला है, जिसका मतलब होता है कपड़े की पट्टी। साड़ी का नाम ही नहीं बल्कि इसका इतिहास भी बहुत पुराना है, जिसके बारे में आज हम आपको बताने वाले हैं। तो आइए जानते हैं कैसे ये भारत का अहम हिस्सा बनती चली गई।
अक्सर ऐसा देखा जाता है कि एक चीज को लेकर लोगों के अलग-अलग मत और दावे होते हैं और ऐसा ही कुछ साड़ी के इतिहार के साथ भी है। ऐसा माना जाता है कि यजुर्वेद में सबसे पहले साड़ी शब्द का उल्लेख मिला है। वहीं ऋग्वेद में कहा गया है कि यज्ञ या हवन के समय पत्नी को साड़ी पहनने का विधान हुआ करता था और धीरे-धीरे यह भारतीय परंपरा का हिस्सा बनती चली गई।
कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार सबसे पुरानी सिंधु घाटी सभ्यता और हड़प्पा संस्कृति में खुदाई के दौरान मिली एक महिला मूर्ति के साड़ी जैसे कपड़े को लपेटेकर पहने जाने का उल्लेख किया गया है। मूर्ति में कपड़े को दोनों पैरों के बीच से लेकर पहना है, जिसे धोती कहा जाता है। इससे ये कहना भी गलत नहीं होगा कि धोती की बढ़ती लंबाई ने इसे साड़ी का रूप दिया है।
भारत में साड़ी का जिक्र महाभारत के चीर हरण प्रसंग से आया है, जब दुर्योधन द्रौपदी का वस्त्र हरण करता है और एक औरत की लाज रखने के लिए श्रीकृष्ण द्रौपदी के पहने वस्त्र की लंबाई बढ़ाकर उनकी रक्षा करते हैं। साड़ी को लेकर कई दावे किए जाते हैं, लेकिन महाभारत की कथा से ये पता चलता है कि साड़ी सिर्फ एक पोशाक नहीं है बल्कि औरत का सुरक्षा कवच भी है।ऐसा माना जाता है कि ब्रिटिश राज से पहले कई जगहों पर साड़ी को बिना ब्लाउज के पहना जाता था। लेकिन बाद में हुए बदलावों के बाद ऐसा माना जाता है कि ज्ञानदानंदिनी देवी पहली बंगाली महिला मानी जाती हैं जिन्होंने ब्लाउज पहना था। ज्ञानदानंदिनी रविंद्र नाथ टैगोर के भाई सत्येंद्र नाथ टैगोर की पत्नी और समाज सुधारक भी थीं
छोटे कपड़े से लेकर धोती और फिर 6 गज की साड़ी तक का ये सफर बहुत ही लंबा है लेकिन आज इसका पैमाना इतना बढ़ गया है कि आपको कई तरह की साड़ियां देखने को मिल जाएंगी। फिर चाहे वो मध्य प्रदेश की चंदेरी हो, असम की मूंगा रेशम हो या गुजरात की पटौला और गठोडा
