नई दिल्ली:– भारत अपनी आर्थिक प्रगति को मापने के तरीके में एक क्रांतिकारी बदलाव करने जा रहा है। अब देश की खुशहाली और तरक्की का आकलन सिर्फ GDP (सकल घरेलू उत्पाद) के आधार पर नहीं, बल्कि NDP (शुद्ध घरेलू उत्पाद) के नए पैमाने से किया जाएगा। मोदी सरकार अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाते हुए विकास की ज्यादा सटीक और ‘ईमानदार’ तस्वीर पेश करने की तैयारी में है।
GDP बनाम NDP: क्या है बुनियादी अंतर?
सालों से हम ‘GDP ग्रोथ’ शब्द सुनते आ रहे हैं। GDP का मतलब है एक साल में देश की सीमाओं के भीतर उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का कुल बाजार मूल्य। यह बताता है कि हमने कुल कितनी ‘कमाई’ की।
लेकिन, NDP (Net Domestic Product) इससे एक कदम आगे की बात है। उत्पादन की प्रक्रिया में मशीनें घिसती हैं, फैक्ट्रियां पुरानी होती हैं और प्राकृतिक संसाधनों (कोयला, तेल, खनिज) का क्षरण होता है। GDP इन नुकसानों को नहीं गिनता, जबकि NDP कुल उत्पादन में से इस ‘घिसावट’ (Depreciation) को घटा देता है।
सीधे शब्दों में समझें:
GDP: महीने की कुल सैलरी (Gross Salary)।
NDP: टैक्स, कटौतियों और खर्चों के बाद हाथ में बची असली रकम (Net Salary)।
सरकार क्यों बदल रही है पैमाना?
भारत वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र के सिस्टम ऑफ नेशनल अकाउंट्स (SNA) के साथ अपने आंकड़ों का तालमेल बिठाना चाहता है। इस बड़े बदलाव के पीछे मुख्य रूप से तीन कारण हैं:
वैश्विक मानक: अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के दिशा-निर्देशों के अनुसार अपनी अर्थव्यवस्था को दुनिया के समकक्ष लाना।
टिकाऊ विकास (Sustainability): सरकार अब यह देखना चाहती है कि विकास की अंधी दौड़ में हमारे प्राकृतिक संसाधनों का कितना नुकसान हो रहा है।
सटीक डेटा: तिमाही आधार पर NDP के आंकड़े जारी होने से अर्थव्यवस्था की असल मजबूती का पता चल सकेगा। सांख्यिकी मंत्रालय इसके लिए 2029-30 तक का लक्ष्य लेकर चल रहा है।
आधार वर्ष (Base Year) में भी होगा बदलाव
सिर्फ मापने का तरीका ही नहीं, बल्कि गणना का आधार भी बदलने वाला है। वर्तमान में GDP की गणना 2011-12 को आधार वर्ष मानकर की जाती है। अब सरकार इसे बदलकर 2022-23 करने जा रही है।
फायदा: इससे आज की डिजिटल इकोनॉमी, स्टार्टअप्स और आधुनिक सेवाओं का सही मूल्य आंकड़ों में शामिल हो सकेगा। नई GDP सीरीज 27 फरवरी को जारी होने की उम्मीद है।
आम आदमी की जेब पर क्या पड़ेगा असर?
इस बदलाव का आपकी सैलरी या टैक्स पर कोई सीधा और तत्काल असर नहीं होगा। हालांकि, इसका दूरगामी प्रभाव सरकारी नीतियों पर पड़ेगा।
नीतिगत बदलाव: जब सरकार को पता चलेगा कि मशीनों या संसाधनों के घिसने से कितना नुकसान हो रहा है, तो वह ‘रिपेयर और मेंटेनेंस’ और ‘पर्यावरण संरक्षण’ पर ज्यादा खर्च करेगी।
बेहतर बुनियादी ढांचा: लंबे समय तक चलने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान केंद्रित होगा, जिससे भविष्य में जनता को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी।
