मौसम विभाग के मुताबिक 4 जून को दक्षिण पश्चिम में केरल तट से म़ॉनसून के टकराने का अनुमान है. इसके बाद ही देश के अन्य भागों में मॉनसून की बारिश होगी. यानी तब तक पूरा देश तेज धूप और धूलों भरी आंंधी से त्रस्त रह सकता है.मॉनसून देरी का क्या होगा असरगौरतलब है कि देश की 3 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की बारिश पर निर्भर है. अगर बारिश न हो तो खेती पर बुरा असर होता है. मॉनसून की बारिश का पानी ही भारतीय खेतों में पैदावार का आधार है.
देश के किसान अपनी फसलों के लिए जून से सितंबर के बीच बारिश का इंतजार करते हैं.मॉनसून में देरी से प्रमुख खरीफ फसलों की बुवाई में भी देरी होने की उम्मीद है. इससे ग्रामीण आय, खपत और आर्थिक विकास के जोखिम पैदा हो सकते हैं.पिछले 5 सालों में सिर्फ एक बार पहली जून को मॉनसून ने दस्तक दी थी. केवल 2018 और 2022 में दो दिन पहले 29 मई को, जबकि 2019 और 2021 में कुछ ही दिनों में बारिश ने दस्तक दी थी.
मॉनसून आमतौर पर 1 जून को केरल तट से टकराता है लेकिन इस साल तीन दिन देरी से 4 जून को दक्षिण-पश्चिम तट पर बारिश होने की उम्मीद है.केरल में मॉनसून की शुरुआत के बाद 15 जुलाई तक पूरे देश में पहुंच जाता है. अगर केरल में ही देर से मॉनसून आएगा तो देश के बाकी हिस्सों में बारिश और देरी से होगी.औसत बारिश की भविष्यवाणीमौसम विभाग ने अप्रैल में कहा था कि जून से सितंबर के बीच सामान्य से औसत बारिश होगी.
जानकारी के मुताबिक साल 1971 से 2020 के बीच इस सीजन में 87 सेमी हुई थी जबकि इस साल भारत में करीब 83.5 सेमी बारिश होगी. बारिश के कम होने से खेती पर बुरा असर पड़ सकता है. मौसम विभाग ने इस साल अल नीनो के खतरे को लेकर भी अलर्ट जारी किया था. अल नीनो का मतलब है मौसम पर बुरा असर. यानी कुल मिलाकर बारिश में देरी से फिलहाल गर्मी से राहत मिलने की उम्मीद कम है. मई में बेमौसम बारिश तो हो गई लेकिन इसके बाद किसान बारिश के लिए तरस सकते हैं.