छत्तीसगढ़:– बालोद में सिंचाई विभाग के मिथिलेश साहू ने कबाड़ की प्लास्टिक टंकी से महज 1000 – 1200 रुपये में देसी कूलर बना दिया. मटके और खस से तैयार इस कूलर में कम पानी में ज्यादा ठंडक मिलती है. एक बार पानी भरने पर यह हफ्तेभर चलता है और जल संरक्षण का संदेश भी देता है.
आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है’ यह कहावत छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में उस समय सच होती नजर आई, जब सिंचाई विभाग के जिला परियोजना समन्वयक मिथिलेश साहू ने कबाड़ में पड़ी एक पुरानी सिंटेक्स टंकी को नया जीवन दे दिया. भीषण गर्मी के बीच जहां लोग महंगे कूलर और एसी की ओर रुख करते हैं, वहीं मिथिलेश ने कम लागत में देसी जुगाड़ से ऐसा कूलर तैयार किया, जो न सिर्फ सस्ता है बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी बेहतर है
1200 रुपये की लागत
मिथिलेश साहू बताते हैं कि गर्मी के दिनों में उनकी नजर एक बेकार प्लास्टिक टंकी पर पड़ी. उसी समय उनके मन में इसे दोबारा उपयोग में लाने का विचार आया. फिर उन्होंने इसे कूलर में बदलने का कॉन्सेप्ट तैयार किया. इस काम के लिए एग्जॉस्ट फैन, कटर मशीन, खस (घास), जाली और रेगुलेटर जैसी सामान्य चीजों की जरूरत पड़ी. इन सभी को मिलाकर करीब 1000 से 1200 रुपये की लागत आई और महज 3 से 4 घंटे में कूलर तैयार हो गया.
इस कूलर की खास बात इसका अनोखा कूलिंग सिस्टम है. टंकी के अंदर एक मटका रखा गया है, जिसमें नीचे की ओर छोटा छेद किया गया है. मटके में भरा ठंडा पानी धीरे-धीरे खस तक पहुंचता है, जिससे हवा और ज्यादा ठंडी हो जाती है. मिथिलेश के अनुसार, इस तकनीक से कूलिंग में लगभग 2 प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखी गई है.
जंग लगने की समस्या भी नहीं
कूलर में एक बार में 5 से 7 लीटर पानी भरा जा सकता है, जो करीब एक सप्ताह तक चलता है. प्लास्टिक बॉडी होने के कारण इसमें जंग लगने की समस्या भी नहीं होती, जिससे इसकी उम्र लंबी हो जाती है. खास बात यह है कि यह कूलर न केवल सस्ता है, बल्कि बिजली और पानी की बचत का भी बेहतर उदाहरण है.
मिथिलेश साहू, जो पेशे से सिंचाई विभाग में कार्यरत हैं, लोगों को जल संरक्षण के प्रति भी जागरूक कर रहे हैं. वे ग्रामीणों को सोखता गड्ढा बनाने और जल स्तर को रिचार्ज करने के लिए प्रेरित करते हैं. उनका यह देसी कूलर इनोवेशन न केवल गर्मी से राहत दे रहा है, बल्कि ‘रीयूज और सेव वॉटर’ का मजबूत संदेश भी दे रहा है. स्थानीय स्तर पर इस पहल की सराहना हो रही है और लोग इसे अपनाने में रुचि दिखा रहे हैं. यह जुगाड़ तकनीक आने वाले समय में कम लागत में अधिक सुविधा देने का एक बेहतरीन उदाहरण बन सकती है
