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    देवों के देव महादेव की पूजा एवं भक्ति करने से मिलते हैं ये अनगिनत लाभ जिसे जान आप हो जाएंगे हैरान…

    By Tv 36 HindustanAugust 3, 2025No Comments6 Mins Read
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    नई दिल्ली:– भगवती पार्वती ने अपने प्राणेश्वर विश्वनाथ शिव से संपूर्ण रामकथा सुनने के बाद भी एक प्रश्न किया। वह प्रश्न था कि वैराग्य, ज्ञान, विज्ञान की प्राप्ति के साथ रामपरायण श्रीकाकभुशुंडि के काक-शरीर होने का रहस्य क्या है?

    जिज्ञासा जब चित्त के हृदय भाग से प्रकट होती है तो समाधान सदाशिव होता है। जिज्ञासा के कई रूप हैं- मन की जिज्ञासा, बुद्धि की जिज्ञासा, अहंकार की जिज्ञासा, भाव और हृदय की जिज्ञासा। ये जिज्ञासाएं चित्त में रहती हैं और अवसर पाकर प्रकट होती हैं।

    शांत और ध्यानस्थ चित्त जब शिवमय होता है, उस समय वह भक्त और भक्ति का प्राकट्य करता है। राम के प्राकट्य में कौशल्या जी माध्यम बनीं तथा काकभुशुंडि के भावनात्मक प्राकट्य को भगवती पार्वती ने अपनी अंतरंग जिज्ञासा से प्रकट किया।

    जन्म लेने के लिए राम गर्भ में आए और काकभुशुंडि की कथा शंकर जी के हृदय से प्रकट हुई, क्योंकि भक्ति का प्राकट्य हृदय से ही होता है। शिव का एक नाम सनातन भी है। ब्रह्मपुराण में दक्ष ने जो शिव की स्तुति की है, उसमें वह शिव के 13 नामों के पश्चात कहते हैं कि प्रभु! आप सनातन हैं।

    हेमसुता पार्वती स्वयं रामपरायण हैं, कदाचित उनके प्रति शिव की प्रियता का प्रमुख कारण भी उनकी रामभक्ति है। शंकर जी काकभुशुंडि के गुरु हैं, पर गरुड़ के मोहपाश के विध्वंस के लिए महादेव उन्हें अपने शिष्य काकभुशुंडि के पास भेजते हैं। श्रीरामचरितमानस जीवन व्यवस्था का संचालनालय है। समाज के लिए शिक्षा, दीक्षा, आचरण, व्यवहार और परमार्थ का इतना सांगोपांग प्रतिनिधित्व कोई अन्य ग्रंथ नहीं करता।

    शिव जानते हैं कि गरुड़ को मोह अज्ञान के कारण नहीं, अपितु अपनी विशेषता के अहंकार के कारण हुआ है। शिव ने माना कि यदि मैं इन्हें मोहमुक्त कर दूंगा तो उन्हें एक और अहंकार हो जाएगा कि मुझे तो शिव से ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने गरुड़ को सुमेरु पर्वत पर कौए (काकभुशुंडि) से कथा सुनने का आदेश देकर यह संकेत किया कि एक कौआ भी भगवान की लीलाओं के रहस्य जानकर उनकी कृपा का प्रचार कर रहा है और तुम भगवान विष्णु के पास रहकर भी अति निकटता के कारण श्रीराम की लीला में चरित्र देख रहे हो? कभी-कभी अतिनिकटता अवज्ञा को जन्म देती है।

    अभिमान को निरभिमान होकर ही जीता जा सकता है। संसार में सुंदर, स्वस्थ और स्वचालित व्यवस्था के लिए वाणी एक ऐसा यंत्र है, जिसमें व्यक्ति स्वयं ही अपने मैं को गौण कर लेता है और व्यक्तित्व का सृजनकर्ता बन जाता है। भगवान शंकर और पार्वती इस विधा के परमाचार्य हैं। वाणी श्रुति की जननी है। मंत्रदृष्टा ऋषियों ने उसे देखा।

    जिसको देखा जा सकता है, वह सगुण है, शब्द रूप में वही निर्गुण है। वेद मंत्रों के दृष्टा जो ऋषि हुए, उन्हें दृष्टा की संज्ञा दी गई और जिसको उन्होंने देखा, वे वेदमंत्र आगे चलकर श्रुति कहलाए। कालांतर में जाकर श्रुति स्वरूप राम का अवतार हुआ, जिन्हें ज्ञानी जनक, शिव, विश्वामित्र, वशिष्ठ, अत्रि आदि मुनियों ने देखा, तो देखा हुआ और सुना हुआ दोनों एक हो गए। वाणी श्रुति बन गई।

    शिव की वाणी पार्वती जी के लिए श्रुति हो गई। मधुरता चाहे फल की हो, वाणी अथवा व्यवहार की हो, श्रुति वही बनेगी जो मधुर होगी। काकभुशुंडि की वाणी गरुड़ की श्रुति बन गई। इसीलिए महर्षि बाल्मीकि ने श्रीराम को श्रुति सेतु की संज्ञा देकर स्तुति की। श्रीराम वाणी और श्रुति को जोड़ने वाले वे वेदोक्त चरित्र हैं, जो अपने अवतार को परम इतिहास बना देते हैं। परम शब्द ईश्वर विषयक है।

    मानस में इस शब्द का प्रयोग अनेक बार ईश्वर विषयों में ही किया गया है। श्रीराम का चरित्र अश्रुतपूर्व है। जो कभी सुना नहीं गया। देखा नहीं गया। जो किसी के मन में पूरा समाया भी नहीं, ऐसा अद्भुत चरित्र राम ने किया। उन्होंने जो जो किया उनके उस सगुण रूप और उनके कार्यों की स्तुति वाणी के द्वारा वेदों ने की। श्रीरामचरित संसार की व्यवस्था संचालन की चाबी है

    श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।

    जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥

    जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी।

    सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी॥

    राम श्रुति सेतु इसलिए कहलाए, क्योंकि उन्होंने लोक और वेद के दो किनारों के बीच अपनी लीला गंगा को प्रवहमान रखकर सबको संतुष्ट और प्रसन्न रखा। गुणी व्यक्ति के जीवन में उसके गुण का अभिमान ही उसको समाप्त या कष्ट में डाल देता है और वह संसार को यह कहकर दोषी और अपने को निर्दोष सिद्ध करता रहता है कि हम अपनी ईमानदारी और कार्यनिष्ठा का फल भोग रहे हैं। संसार में ईमानदारी का कोई स्थान नहीं है। वह यह जानता ही नहीं है कि गुण को वाणी उपादान के द्वारा जीवन को शांति, सुख और आनंद के सृजन की पवित्र धारा बनाया जाता है, जिसमें सब नहाएंगे और आचमन करेंगे।

    किसी के गुण को वाणी का विषय बनाने से परब्रह्म (पर+ब्रह्म) प्रकट होता है। पर में ब्रह्म दिखाई देना ही साधना है, बाकी गुण केवल अहं को बढ़ाते हैं। अहं ब्रहास्मि में से अहं निकालने पर ही ब्रह्म शेष रहता है। यह भक्ति और ज्ञान की वह सनातन धारा है, जिसको शंकर जी ने अपने शीष पर धारण किया।

    उनके आशीष से पार्वती जी ने उसको आत्मसात् कर लिया और श्रोता व वक्ता दोनों ने एक दूसरे के गुणों की खुलकर प्रशंसा की। कहीं पर शंकर जी वाणी बनते हैं और पार्वती श्रुति बनती हैं तो कहीं पर पार्वती वाणी बनती हैं और शिव श्रुति बनते हैं। यही सेतुत्त्व है, यही मिलन है, यही सौभाग्य है, यही शृंगार है, यही शरीर का अशरीरी स्वरूप है।

    काकभुशुंडि गरुड़ के ज्ञान और ऐश्वर्य की प्रशंसा करते हैं। गरुड़ काकभुशुंडि की भक्ति और उनके भक्त स्वरूप की प्रशंसा करते हुए स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं। दोनों पक्ष अपने को सौभाग्यशाली मानें, यही तो निष्पक्षता है। वाणी और श्रुति का पूरक तत्त्व भी है। वेद का उद्देश्य भी ज्ञान, भक्ति, कर्म का संतुलन और ईश्वर को अर्पण ही है। काकभुशुंडि कथा करने के बाद पक्षीराज गरुड़ से कहते हैं कि आज मैं धन्य हो गया कि आप जैसे संतों ने आकर कथा सुनी।

    आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन।

    निज जन जान राम लमोहिं संत समागम दीन्ह।।

    अंत में गरुड़ जी का मोह समाप्त हो चुका था और वे भी बोले :

    मैं कृतकृत्य भयउं तव बानी।

    सुनि रघुबीर भगति रस सानी।।

    आपकी कृपा से श्रीराम के चरणों में मेरी नई प्रकार की भक्ति उत्पन्न हुई है। अज्ञानजन्य माया के प्रभाव से मैं विपत्ति में पड़ गया था, उससे मैं विमुक्त हो गया।

    प्रयागराज में याज्ञवल्क्य और भरद्वाज के बीच भी इसी मधुर संवाद का विनिमय हुआ।

    यहां पार्वती जी कहती हैं कि

    धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी।

    सुनेहुं राम गुन भव भय हारी।।

    मैं धन्य हो गई, धन्य हो गई और पुन: धन्य हो गई, जो आपने भगवान के चरणों में रति देने वाली कथा सुनाई। तुलसीदास जी कहते हैं कि संसार में जब इस प्रकार का संवाद होगा तो संसार मिथ्या अहंकार के कारण जो एक-दूसरे को समाप्त करने पर तुला हुआ है। शांति, सुख और आनंद में परिणत हो जाएगा।

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