नई दिल्ली:– हिंदू धर्म में सेवा, दान और भक्ति को सर्वोच्च स्थान दिया गया है, लेकिन अगर यही सेवा श्रीधाम वृंदावन में की जाए तो उसका फल सामान्य से कहीं अधिक हो जाता है। श्री प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, वृंदावन वह पावन धाम है जहां किया गया प्रत्येक सत्कर्म “करोड़ गुना” फल देने वाला बन जाता है। खासतौर पर यदि कोई व्यक्ति भगवान के प्रेमी, त्यागी और साधना में लीन संतों की सेवा करता है, तो उसे अनंत पुण्य और भगवत कृपा प्राप्त होती है।
वृंदावन में सेवा का अद्भुत महत्व
श्रीधाम वृंदावन में रहने वाले वे भक्त, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित कर दिया है, उनकी सेवा करना सामान्य दान नहीं माना जाता। चाहे जल देना हो, भोजन कराना हो, वस्त्र या आश्रय प्रदान करना हो ऐसी सेवा का आध्यात्मिक प्रभाव मानव बुद्धि से परे बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार, यहां की गई सेवा का फल अन्य स्थानों की तुलना में करोड़ों गुना बढ़ जाता है।
पहला मार्ग अहंकार का है: जब व्यक्ति यह सोचकर देता है कि “यह मेरा धन है और मैं दे रहा हूं”, तो उसे सांसारिक फल मिलता है, जो सीमित होता है।
दूसरा मार्ग भक्ति का है: जब दान यह सोचकर किया जाए कि “हे प्रभु, यह सब आपका है और मैं आपके भक्तों को लौटा रहा हूं”, तो उसका फल भगवत प्रेम, नाम रस की रुचि और राधा-कृष्ण की लीलाओं में स्वाभाविक आकर्षण के रूप में प्राप्त होता है।
पात्रता का विवेक जरूरी
महाराज जी सावधान करते हैं कि दान करते समय विवेक अत्यंत आवश्यक है।
भोजन, वस्त्र और जल जैसे मूलभूत आवश्यकताओं के लिए पात्रता न देखें, मानवता के नाते सेवा करें।
लेकिन धन दान करते समय अत्यधिक सतर्क रहें, क्योंकि यदि धन गलत कार्यों में लगा तो पाप का भागी स्वयं दानकर्ता भी बनता है।
निश्किंचन संतों की सेवा सबसे श्रेष्ठ
वे संत जो कुछ नहीं चाहते, केवल श्रीकृष्ण प्रेम में रमे रहते हैं, उन्हें ‘निश्किंचन’ कहा गया है। ऐसे भक्तों की थोड़ी सी सेवा से भी भगवान स्वयं कृतज्ञ हो जाते हैं। भले ही आप वृंदावन में निवास न कर पाएं, लेकिन वहां के विरक्त साधुओं की सेवा करके आप वहां रहने के समान पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।
प्रभु की कृपा और मोह का नाश
महाराज जी एक प्रसंग बताते हैं कि जब भगवान अत्यंत कृपा करते हैं, तो वे संसार के मोह को काट देते हैं। जैसे कहा गया है: “जिस पर मैं कृपा करता हूं, उससे पहले उसका धन और आसक्ति छीन लेता हूं।” यह जीवन का नाश नहीं, बल्कि अहंकार, काम और क्रोध का नाश है, जो अंततः सच्चिदानंद की ओर ले जाता है।
सबसे बड़ा साधन: नाम स्मरण
अंत में श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि सेवा के साथ-साथ सबसे बड़ा साधन है हर श्वास के साथ “राधा राधा” का स्मरण। एक क्षण भी नाम से खाली न जाने दें, यही सबसे बड़ी सेवा है।
