नई दिल्ली:- 37 साल की नीलम वर्मा और अमोल शिंदे ने वहां ‘तानाशाही नहीं चलेगी’ के नारे लगाए और छोटे कनस्तर से पीले रंग का धुआं छोड़ा.हरियाणा के जींद की रहने वाली नीलम आस-पास के इलाके में अपनी क्रांतिकारी छवि के लिए जानी जाती हैं, वह कई विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा ले चुकी हैं.
उन्हें उनके गांव में सभी जानते हैं, उनका नाम लें तो गांव वाले आपको उनके घर तक छोड़ कर आएंगे.नीलम वर्मा अपने माता-पिता की सबसे बड़ी संतान हैं. वे विवादित कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ दिल्ली की सीमा पर किसानों के प्रदर्शन का भी हिस्सा रही हैं.
नीलम की मां सरस्वती ने अपनी बेटी के बारे में कहा,नीलम नौकरी न मिलने के कारण परेशान थीं और हरियाणा टीचिंग के लिए दिए गए अपने एचटीईटी परीक्षा को लेकर चिंतित थीं, उनका स्कोरकार्ड इस साल ही एक्सपायर होने वाला है.
उनके परिवार वालों के मुताबिक़ वो कहा करती थी कि काबिल होने के बावजूद उन्हें नौकरी नहीं मिल रही है ओर उनका मर जाना बेहतर है.”
नीलम के छोटे भाई रामनिवास ने बताया, “हिसार के उकलाना में रहने वाले मेरे बड़े भाई ने मुझे फ़ोन किया और कहा कि मैं टीवी खोलूं और नीलम को संसद के बाहर से हिरासत में ले लिया गया है. हमें तो पता ही नहीं था कि वो दिल्ली क्यों गई. वो किसानों के प्रदर्शन में, पहलवानों के प्रदर्शन में हिस्सा ले चुकी हैं.
वे कहते हैं,शुरू में टीवी पर न्यूज़ देखने के बाद मुझे निराशा हुई, लेकिन बाद में एहसास हुआ कि भगत सिंह ने भी देश को अंग्रेज़ों से आज़ादी दिलाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी और नीलम ने भी देश में बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई, इसलिए हम उसके साथ हैं.
किसान आंदोलन में हो चुकी हैं शामिल
इस साल 28 मई को जब जंतर मंतर पर पहलवानों के समर्थन में विरोध प्रदर्शन हुए तो नीलम उसमें भी शामिल थीं और पुलिस ने उन्हें हिरासत में भी लिया था.वह 26 नवंबर 2020 को दिल्ली-पटियाला हाइवे से हरियाणा के उचाना कलां शहर में प्रवेश करने पर पंजाब के किसानों का स्वागत करने वालों में भी थीं.
नीलम की मां सरस्वती ने अपनी बेटी के बारे में कहा,2015 में मेरी बेटी दूसरी मंज़िल से गिर गई थी. उसे रीढ़ में गहरी चोट आई थी. तीन साल तक बिस्तर पर पड़ी रही, जिससे उसके सपने चकनाचूर हो गए. चोट लगने के बाद लड़के वालों ने रिश्ते के लिए भी मना कर दिया.इसके बाद उसने लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने की ठानी. उसने मनरेगा योजना के तहत काम करने वाले दलित लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने का फ़ैसला किया.
गांव में मनरेगा पर उठाए थे सवाल
मां कहती हैं, मेरी बेटी ने मनरेगा योजना की ऐसी गड़बड़ी उजागर की जिसमें इस योजना का फ़ायदा उन लोगों को मिल रहा था जो इसके तहत काम पाने के हक़दार नहीं थे.
उसने अधिकारियों से मुलाक़ात की और असल लाभार्थियों को काम मिले ये सुनिश्चित किया. मेरी बेटी ने हमारे गांव में दो साल पहले एक लाइब्रेरी खोली.लेकिन मनरेगा की गड़बड़ी उजागर करने के बाद उसे लाइब्रेरी का मकान खाली करना पड़ा, ये एक ऐसे व्यक्ति का मकान था जो शहर में रहते थे.
नीलम की मां ने बताया,इसके बाद वो लाइब्रेरी को पास के गांव घशो कलां ले गयी. वह लंबे समय से इस सिस्टम के साथ संघर्ष कर रही है, लोगों के अधिकारों के लिए लड़ रही है.
वे रुंधे हुई आवाज़ में कहती हैं, “हाशिए पर लोगों के हक़ के लिए आवाज़ उठाने के कारण कई लोगों की आंखों में वो खटकने लगी थी. पांच महीने पहले ही हमने उसे आगे की पढ़ाई के लिए हिसार भेजा था. वहां वो एक पीजी में रह रही थी. बुधवार को जो उसने किया हमें उसकी कोई जानकारी नहीं थी.”
