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    Home » भारत में मदरसों पर किसका रहता है नियंत्रण, कौन करता है फंडिंग, राहुल गांधी और हिमंत बिस्वा मदरसों पर भिड़े…
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    भारत में मदरसों पर किसका रहता है नियंत्रण, कौन करता है फंडिंग, राहुल गांधी और हिमंत बिस्वा मदरसों पर भिड़े…

    By Tv 36 HindustanOctober 1, 2024No Comments7 Mins Read
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    : मदरसे पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के बीच जुबानी जंग छिड़ी हुई है. हिमंत बिस्वा ने कहा है देश को डॉक्टर व इंजीनियर की जरूरत, मुल्ला की नहीं. इसी बहाने मदरसों पर चर्चा शुरू हो गई है. आइए इसी बहाने जान लेते हैं क्या है मदरसों का इतिहास, भारत में इन्हें कौन चलाता है, कहां से फंडिंग होती है और सरकार का इन पर कितना नियंत्रण होता है?भारत में मदरसों पर किसका कंट्रोल, कौन करता है फंडिंग? इन्हें बंद करने पर भिड़े हिमंत बिस्वा और राहुल गांधीअसम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के मदरसे वाले बयान पर राहुल गांधी ने निशाना साधा है

    हरियाणा के सोनीपत में चुनाव प्रचार के बीच असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा है कि उनसे असम में कांग्रेसियों ने पूछा कि 600 मदरसे क्यों बंद कर दिए गए? इसके जवाब में उन्होंने कि बाकी भी बंद कर दूंगा. देश को डॉक्टर व इंजीनियर की जरूरत, मुल्ला की नहीं. देश में घूम रहे बाबर को बाहर करना होगा. इसके बाद मदरसों को लेकर फिर से चर्चा शुरू हो गई है.आइए इसी बहाने जान लेते हैं मदरसों का इतिहास. भारत में इन्हें कौन चलाता है, कहां से फंडिंग होती है और सरकार का इन पर कितना नियंत्रण होता है

    .दुनिया में ऐसे हुई मदरसों की शुरुआतमदरसा वास्तव में अरबी का शब्द है, जिसका मतलब है पढ़ने का स्थान. यह मूल रूप से हिब्रू भाषा से अरबी में आया. हिब्रू में इसे मिदरसा कहा जाता है. मदरसों की शुरुआत मस्जिदों में दिए जाने वाले व्याख्यान के जरिए मानी जाती है. बाद में इन व्याख्यानों में आने वाले छात्रों के लिए मस्जिदों में रहने-खाने की व्यवस्था भी की जाने लगी. हालांकि, व्यवस्थित ढंग से दुनिया में मदरसों की शुरुआत का श्रेय 11वीं सदी में सेल्जुक के अधीन एक वजीर रहे निजाम अल-मुल्क को दिया जाता है, जिसने ईरान, खुरासान और मेसोपोटामिया में मदरसों का पहला नेटवर्क बनाया था. धीरे-धीरे मदरसे ओटोमन साम्राज्य में सेवा देने वाले संस्थान बनते गए और साल 1330 से अगले लगभग 600 वर्षों तक तीन महाद्वीपों पर काम किया

    भारत में यहां हुई पहले मदरसे की स्थापनाजहां तक भारत में मदरसों के इतिहास की बात है तो इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि यहां पहला मदरसा अजमेर में साल 1191-92 में खोला गया था. यूनेस्को का मानना है कि भारत में 13वीं शताब्दी में मदरसों की शुरुआत हुई थी. इसके बाद भारत में मदरसों की संख्या बढ़ती गई और अकबर के शासन में इनमें इस्लामिक शिक्षा के साथ ही अन्य विषयों की शिक्षा देने की भी शुरुआत हुई.अंग्रेजों ने भी अपने शासनकाल में भारत में मदरसे खोले थे. सबसे पहले वारेन हेस्टिंग्स ने साल 1780 में कलकत्ता (अब कोलकाता) में अंग्रेजी सरकार का पहला मदरसा खोला था. कलकत्ता मदरसा की शुरुआत कोलकाता में सियालदह के पास बैठकखाना में हुई थी, जिसे बाद में वेलेस्ले स्क्वायर में स्थानांतरित कर दिया गया, जहां यह आज भी स्थित है. वारेन हेस्टिंग्स ने तो इसे कलकत्ता मोहम्मडन कॉलेज नाम दिया था पर आज इसे आलिया विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता था.

    अंग्रेजों ने स्वरूप में किया बदलावअंग्रेजों ने मदरसों पर नियंत्रण कर लिया और उन्हें ओरिएंटल कॉलेज के रूप में बदल दिया, जहां फारसी और अरबी के साथ-साथ कानून और राजनीति की भी पढ़ाई होने लगी. देश की आजादी के बाद मदरसों का आधुनिकीकरण भी हुआ. कई मदरसों ने अपने पाठ्यक्रम में आधुनिक शिक्षा को भी शामिल किया. तब मदरसों को इस्लामी ज्ञान का प्रतीक माना जाता था और इनमें बड़ी संख्या में लोगों को शिक्षा दी जाती थी. इसके बावजूद मदरसों का स्वरूप धर्मनिरपेक्ष होता था और इनमें गैर मुस्लिम बच्चे भी शिक्षा पाते थे. 19वीं सदी के अंत तक मदरसों का यह स्वरूप बना रहा.

    कहा जाता है कि देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, समाज सुधारक राजा राममोहन राय और मुंशी प्रेमचंद ने शुरुआती पढ़ाई मदरसों से ही की थी.यह साल 1844 की बात है, जब मदरसों के स्वरूप में बदलाव आना शुरू हुआ था. इनमें पढ़कर पास हुए छात्रों के लिए अंग्रेजों ने सरकारी नौकरियों के दरवाजे बंद कर दिए. तब अचानक लोगों पर अंग्रेजी थोप दी गई, जिसको स्वीकार करना आसान नहीं था. बांटों और राज करो नीति के तहत अंग्रेजों ने मुसलमानों की पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी और इसे धार्मिक और गैर धार्मिक श्रेणियों में बांट दिया.

    sमदरसों को कहां से मिलता है पैसा?मदरसों की अर्थव्यवस्था की बात करें तो जब इनकी शुरुआत हुई थी तो शासन और धनाड्य लोग इनके लिए धन की व्यवस्था करते थे. फिर मदरसा व्यवस्था आम लोगों के दान से चलने लगी. इनमें सभी छात्रों को मुफ्त शिक्षा दी जाती थी. समय बदला और कुछ मदरसे स्वायत्त बने रहे, पर कुछ सरकारी मदद से संचालित होने लगे. कई राज्य सरकारें मदरसों को आधुनिया शिक्षा मुहैया कराने के लिए धन मुहैया कराती हैं तो केंद्र सरकार मदरसा आधुनिकीकरण योजना (एमएमएस) के तहत ढांचागत विकास, शिक्षकों की ट्रेनिंग और पाठ्यक्रम विकास के लिए धन मुहैया कराती है.

    इनके अलावा कई गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) भी मदरसों के संचालन के लिए धन देते हैं. इनमें भारतीय ही नहीं, विदेशी एनजीओ भी हैं. मदरसों को दान देने की प्रथा अब भी कायम है. कुछ धार्मिक संगठन भी इनको दान करते हैं. कुछ मदरसे छात्रों से शुल्क भी लेते हैं तो कुछ व्यावसायिक गतिविधियों जैसे अपनी संपत्ति किराए पर देकर धन की व्यवस्था करते हैं.रोजगार के अवसर भी मिलतेमदरसों में धार्मिक शिक्षा दी जाती है, जो उन्हें अपने धर्म को समझने और उसकी शिक्षाओं का पालन करने में मददगार होती है. नैतिक शिक्षा के जरिए अच्छे नागरिक बनाने और समाज में योगदान के लिए मूल्यों का विकास भी इनकी शिक्षा व्यवस्था में शामिल है. इनके छात्रों को अब कई तरह की ट्रेनिंग, आधुनिक शिक्षा और धार्मिक नेतृत्व आदि की पढ़ाई कराई जाती है, जिससे इनको रोजगार के अवसर मिलते हैं.

    अलग-अलग स्तर के होते हैं मदरसेजिस तरह से स्कूल प्राइमरी, सेकेंडरी और सीनियर सेकेंडरी स्तर के होते हैं, उसी तरह से मदरसे भी अलग-अलग स्तर के होते हैं. ग्रेजुएशन स्तर की भी पढ़ाई इनमें होती है. इनके तीन स्तर हैं तथानिया, फौकानिया और आलिया. तथानिया प्राइमरी मदरसा होता है. फौकानिया जूनियर और आलिया में मुंशी, मौलवी, आलिम, कामिल और फाजिल की पढ़ाई कराई जाती है. मुंशी या मौलवी की परीक्षा हाईस्कूल, आलिम की इंटरमीडिएट और कामिल की स्नातक स्तर की मानी जाती है. इन्हें सरकारी नौकरियों में भी मान्यता मिलती है.मुंशी और मौलवी की पढ़ाई में धर्मशास्त्र (शिया/सुन्नी) अनिवार्य विषय है. मौलवी के लिए ए-अरबी लिटरेचर की पढ़ाई जरूरी है. लेखक के लिए बी फारसी लिटरेचर, उर्दू लिटरेचर, सामान्य अंग्रेजी और सामान्य हिन्दी की पढ़ाई होती है. गणित/गृहविज्ञान/तर्क और दर्शन / सामान्य विज्ञान /विज्ञान/तिब्बती की पढ़ाई होती है. मदरसों में धार्मिक शिक्षा के तहत कुरान, हदीस, फिकह और तफसीर पढ़ाई जाती है.

    सरकार द्वारा संचालित बोर्ड के अधीनमदरसे अब सीधे राज्य सरकारों के नियंत्रण में आते हैं. जिस तरह से अलग-अलग राज्यों के लिए अपने शिक्षा बोर्ड हैं, उसी तरह से मदरसों के लिए भी शिक्षा बोर्ड हैं. उदाहरण के लिए अगर हम उत्तर प्रदेश की बात करें तो उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की तर्ज पर ही यहां उत्तर प्रदेश मदरसा एजुकेशन काउंसिल है. यह काउंसिल ही मदरसों की सभी परीक्षाओं के लिए पाठ्यक्रम तैयार करता है.सीबीएसई की तर्ज पर भारत सरकार की ओर से मदरसा बोर्ड ऑफ इंडिया की स्थापना की गई है. यह आधुनिक शिक्षा पर केंद्रित है और इससे मान्यता प्राप्त मदरसों में विज्ञान, गणित, अंग्रेजी, हिन्दी, और सामाजिक विज्ञान जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं.

    इनके अलावा मदरसों के संचालन के लिए कुछ और बोर्ड भी हैं, जिनसे मान्यता लेनी होती है. इनमें एक है दारी उलूम देवबंद. दारी उलूम देवबंद बोर्ड दीनी शिक्षा पर आधारित है. इससे मान्यता प्राप्त मदरसों में कुरान, हदीस, तफसीर, फिकह और इस्लामी इतिहास आदि विषयों की पढ़ाई होती है. वहीं, नदवातुल उलमा बोर्ड दीनी और आधुनिक शिक्षा का मिश्रण है. इसके मदरसों में कुरान, हदीस, तफसीर, फिकह और इस्लामी इतिहास के साथ ही साथ विज्ञान, गणित, अंग्रेजी, हिन्दी और सामाजिक विज्ञान की भी पढ़ाई होती है.

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