नई दिल्ली:– सुप्रीम अदालत ने गुरुवार को ओबीसी यानी अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण को लेकर एक बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि किसी उम्मीदवार के क्रीमी लेयर में होने या न होने का निर्धारण केवल सिर्फ और सिर्फ उसकी पारिवारिक आय के आधार पर नहीं किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि पदों की श्रेणियों और स्टेटस के मापदंडों का संदर्भ लिए बगैर, महज आय के आधार पर क्रीमी लेयर का दर्जा तय करना कानूनी रूप से सही और टिकाऊ नहीं है। कोर्ट का मानना है कि आय के साथ-साथ व्यक्ति के सामाजिक और व्यावसायिक पद को भी ध्यान में रखा जाना अनिवार्य है।
आखिर क्या है यह क्रीमी लेयर?
गौरतलब है कि क्रीमी लेयर शब्द का प्रयोग ओबीसी समुदाय के उन लोगों के लिए किया जाता है जो आर्थिक और सामाजिक रूप से काफी समृद्ध हो चुके हैं। रिजर्वेशन का लाभ इस वर्ग को न मिलकर समुदाय के उन गरीब और पिछड़े लोगों तक पहुंच सके, जिन्हें इसकी सही मायनों में आवश्यकता है।
कब आया क्रीमी लेयर कॉन्सेप्ट?
क्रीमी लेयर अवधारणा की शुरुआत 1992 के प्रसिद्ध इंद्रा सहनी बनाम भारत सरकार मामले के बाद हुई थी। उस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण को तो बरकरार रखा था, लेकिन संपन्न तबके को इससे बाहर रखने का आदेश दे दिया था। जिसके बाद 1993 में सरकार ने इसे लागू करने के नियम बनाए थे।
क्या कहता है मौजूदा प्राविधान?
मौजूदा नियमों के अनुसार, यदि किसी ओबीसी परिवार की वार्षिक आय 8 लाख रुपये से अधिक है तो उसे क्रीमी लेयर श्रेणी में रखा जाता है। इन उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाता है। क्रीमी लेयर में आय की यह सीमा आखिरी बार 2017 में 6 लाख रुपये से बढ़ाकर 8 लाख रुपये की गई थी।
सरकार बदलेगी 1993 का नियम?
इनकम के अलावा उच्च संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों, वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, सशस्त्र बलों के उच्च अधिकारियों और बड़े व्यवसायियों के बच्चों को भी क्रीमी लेयर की श्रेणी में रखा जाता है। सर्वोच्च अदालत के इस नए फैसले से सरकार पर क्रीमी लेयर की पहचान करने वाले 1993 के नियमों की समीक्षा करने का दबाव बढ़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ संकेत दिया है कि केवल पैसे को पैमाना मान लेना सामाजिक न्याय के व्यापक उद्देश्यों के खिलाफ हो सकता है। उदाहरण के तौर पर एक कम वेतन पाने वाला व्यक्ति भी अगर ऊंचे प्रशासनिक पद पर है तो उसकी सामाजिक स्थिति एक अमीर व्यापारी से अलग हो सकती है।
