नई दिल्ली:– दस दिवसीय पर्युषण पर्व का जैन धर्म में विशेष महत्व बताया गया है. पर्युषण महापर्व के दौरान जैन धर्म के लोग अपने आत्मचिंतन पर ध्यान केंद्रित करते हैं. ऐसा माना जाता है कि जैन धर्म के साधु-साध्वी दीक्षा लेने के बाद बहुत ही कठोर जीवन व्यतीत करते हैं. वे अपने आप में अनुशासित जीवनशैली व्यतीत करते हैं, जिसके लिए कई सारे नियमों बनाए गए हैं. ऐसे ही कुछ नियमों में से एक है स्नान न करना. अक्सर कई लोगों के मन में यह सवाल आता है कि आखिर क्यों जैन साधु-साध्वियां स्नान नहीं करते हैं. जबकि स्वच्छता तो हर धर्म का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है.
जैन साधु-साध्वियां क्यों नहीं करते स्नान?
जैन धर्म के साधु-साध्वी दीक्षा लेने के बाद स्नान नहीं करते हैं. ये उनकी अनुशासित जीवनशैली का ही एक हिस्सा है. ऐसी मान्यताएं हैं कि स्नान करने से सूक्ष्म जीवों का जीवन खतरे में पड़ता है. यही कारण है कि ये लोग मुंह पर भी एक सफेद कपड़ा रखते हैं, जिसे मुख पत्ती कहा जाता है. ताकि सूक्ष्म जीवों को कोई हानि न हो. दूसरा, वे शरीर की सफाई से ज्यादा आत्मा की शुद्धि पर ध्यान केंद्रित करते हैं.
सामान्यत: लोग रोज पानी से नहाते हैं. ताकि उनका शरीर साफ और तरोताजा रहे. लेकिन जैन साधु-साध्वियां अपने अपने ऊपरी शरीर की ही नहीं, बल्कि मन और विचारों की भी सफाई करते हैं. उनके लिए अंदर के सारे नकारात्मक भाव और गलत सोच को दूर करना ही असली स्नान है. जब वे ध्यान में बैठते हैं और मन को शांत रखते हैं, तो वही उनका असली आंतरिक स्नान होता है. इस दौरान वे अपने मन को शुद्ध कर लेते हैं, जिससे उनका पूरा शरीर साफ हो जाता है.
इसके अलावा, साधु-साध्वियां शरीर की सफाई के लिए कुछ दिनों के अंतराल में गीले कपड़े से अपने शरीर को पोंछते हैं. यह तरीका उनके लिए सबसे सही माना जाता है. ताकि उनका शरीर भी साफ और स्वच्छ रहे. क्योंकि उनका मुख्य ध्यान शरीर से ज्यादा मन की सफाई पर होता है. यही वजह है कि उनके लिए आंतरिक शुद्धि ज्यादा महत्वपूर्ण होती है.
मन की शुद्धि पर होता है ध्यान
दीक्षा लेने के बाद जैन साधु-साध्वी हर तरह की सुविधा का त्याग कर देते हैं. जैसे बिस्तर, पंखा, जूते-चप्पल आदि. उनका पूरा जीवन सादगी से भरा होता है. स्नान भी उनके लिए एक तरह के शारीरिक सुख में आता है. इसलिए वे इसे भी छोड़ देते हैं. यह त्याग उनके लिए साधना का ही एक हिस्सा होता है.
