नई दिल्ली :- मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, गुरु देवो भव, अतिथि देवो भव, वेद वाणी है। इसी प्रकार शास्त्र कहता है, मात्र प्रणाम करने से, सदाचार के पालन से एवं नित्य वृद्धों की सेवा करने से आयु, विद्या, यश व बल की वृद्धि होती है। यदि हम जीवों के प्रति परोपकार की भावना रखें, तो अपनी कुण्डली में रुष्ट ग्रहों की रुष्टता को न्यूनतम कर सकते हैं। हर व्यक्ति पर किसी न किसी ग्रह का अपना एक विशेष प्रभाव रहता है, इस प्रकार का विशेष प्रभाव उसके आचार-विचार, व्यवहार व जीवन की कुछ विशेष व प्रमुख घटनाओं के माध्यम से प्रकट होता है। नौ ग्रह इस चराचर जगत में पदार्थ, वनस्पति, तत्व, पशु-पक्षी इत्यादि सबमें अपना प्रतिनिधित्व समाहित रखते हैं। इसी तरह ऋषि, महर्षियों ने पारिवारिक सदस्यों और आसपास के लोगों में भी ग्रहों का प्रतिनिधित्व बताया है।
सूर्य आत्मा के साथ-साथ पिता का प्रतिनिधित्व करता है और चंद्रमा मन के साथ-साथ माता का, मंगल पराक्रम के साथ-साथ छोटे भाइयों का, शनि दुःख के साथ सेवक का, बृहस्पति ज्ञान के साथ गुरू एवं बड़े भाई तथा उनके समकक्ष लोगों का, बुध वाणी के साथ-साथ मामा का, शुक्र ऐश्वर्य के साथ जीवनसाथी का कारक है। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है, कि जीवनसाथी को कष्ट देने पर शुक्र प्राकृतिक तौर पर निर्बल होने लगता है, जिसके कारण व्यक्ति का ऐश्वर्य कम हो जाता है।
यदि सूर्य ग्रह रुष्ट है तो पिता को प्रसन्न करें, चंद्र पीड़ादायक हो तो माता अथवा माता समान स्त्रियों को प्रसन्न करें, मंगल कष्टकारी है तो छोटे भाई व बहन को प्रसन्न करें, बुध पीड़ादायक है तो मामा एवं बंधुओं को प्रसन्न करें, बृहस्पति रुष्ट है तो गुरुजन एवं वृद्धों को प्रसन्न करें, शुक्र रुष्ट है तो पत्नी को प्रसन्न करें, शनि कष्ट दे रहा हो तो दास-दासी को प्रसन्न करें, राहु कष्टकारी है तो अंगहीन को प्रसन्न करें और यदि केतु अप्रसन्न है तो दीन-हीन, रोगी की सहायता करें। यदि हम प्रेम, सत्कार व आदर का भाव रखकर ग्रहों के प्रतिनिधि के साथ उचित व्यवहार करें तो निश्चित ही रुष्ट ग्रह अपनी कोपता को त्याग कर शांत होंगें।
