भारत का मून मिशन चंद्रयान-3 चांद की सतह पर उतरने को तैयार है. चंद्रयान 3 का चांद पर पहुंचना भारत की महत्वाकांक्षा को पूरा करने की कहानी है. चांद की कक्षा में इस वक्त भारत का बना चंद्रयान 3 कुछ ही दिनों बाद उतर जाएगा जिसमें शामिल है लैंडर मॉड्यूल और रोवर. ये भारत की वैज्ञानिक गाथा का कीर्तिमान रचेंगे. चंद्रमा पर चंद्रयान 3 अभियान के तीन मुख्य काम हैं.
चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित सॉफ्ट लैंडिंग, चंद्रमा पर रोवर उतारना और चंद्रमा की सतह की जांच.खास बात ये है कि चंद्रयान 3 ने चंद्रयान 2 के ऑर्बिटर का इस्तेमाल करके ही चांद का रास्ता तय किया. एक बार लैंडिंग होने के बाद ये करोड़ों साल से अंतरिक्ष के अंधेरे में डूबी चांद की सतह के ऊपर और नीचे की जांच करेगा. साथ ही चंद्रमा के वातावरण की भी जांच करेगा.
चांद पर कामयाबी से उतरने के बाद ये सिर्फ वैज्ञानिक नहीं बल्कि आर्थिक रूप से भी एक बड़ी सफलता होगी. मून इकोनॉमी पर हिंदुस्तान की धाक भी नजर आने लगेगी.आखिर क्या है मून इकोनॉमीचांद पर जाने की रेस में भारत उन चुनिंदा देशों में हो जाएगा जो पृथ्वी के इस उपग्रह में जा कर ना सिर्फ खोज कर सकते हैं बल्कि अगले चरण का रास्ता भी साफ कर सकते हैं. माना जा रहा है चांद पर लोगों को बसाने की भी प्लानिंग है.
भविष्य में युद्ध, रिसर्च और यहां तक कि छुट्टी मनाने के लिए भी चांद पर बेस बनाए जा सकते हैं. स्पेस एक्स जैसी कई कंपनियां चांद तक के ट्रांसपोर्ट को बड़ा बिजनस मान रही हैं. चंद्रयान के जरिए भारत उस बड़े बिजनस में अपनी हिस्सेदारी के लिए तैयार है. प्राइस वॉटरहाउस कूपर के अनुमान के मुताबिक चांद तक होने वाले ट्रांसपोर्टेशन का व्यापार दो हज़ार 40 तक बयालीस बिलियन डॉलर तक हो सकता है.चांद से मिलने वाला डाटा भी बेहद अहम होने वाला है.
हर देश सफलतापूर्वक चांद पर नहीं उतर सकता. तो वो वहां से मिलने वाली जानकारी भारत से ही करोड़ों डॉलर में खरीदी जाएगी ताकि बिना यान भेजे चांद पर रिसर्च की जाए. इसके साथ ही एक अनुमान के मुताबिक साल 2030 में 40 और 2040 तक चांद पर 1000 एस्ट्रोनॉट रह रहे होंगे. उनके जाने से पहले चांद की सतह की जानकारी इकट्ठा करना बेहद ज़रूरी है, ताकि वहां रहने के लिए बेस बनाने की तैयारी की जाए.चंद्रयान 3 इसके लिए भी बेहद जरूरी जानकारी जुटाएगा. ये जानकारी भी करोड़ों डॉलर कमाने के काम आएगी.
चांद पर कम्यूनिकेशन के नेटवर्क बनाना. एस्ट्रॉनॉट के लिए उपकरण ले जाने के लिए भी एक बेस बनाया जाएगा, जिसके लिए भी चंद्रयान 3 की रिसर्च काम आएगी. एक अनुमान के मुताबिक अकेला अमेरिका 2040 तक 634 बिलियन डॉलर की कमाई के साथ इस लूनर इकोनॉमी का सबसे बड़ा हिस्सेदार बनेगा. सिर्फ सरकारें ही नहीं निजी कंपनियां जैसे आईस्पेस और एस्ट्रॉबॉटिक चांद की सतह तक कार्गो ले जाने की तैयारी कर रही हैं
नए मिशन के साथ चुनौतियां फिर वहीं खड़ी हैं लेकिन इस बार तैयारियां पहले से बेहतर हैं. चंद्रयान को सफलतापूर्वक उतारने के लिए फिलहाल उसकी स्पीड 6048 किलोमीटर प्रति घंटा से कम करके करीब 10 किलोमीटर प्रतिघंटा तक लानी होगी जिससे पहले उसे अपनी दिशा सीधी करनी होगी ताकि लैंडर ठीक से लैंड हो सके.
लैंडर का झुकाव ज़्यादा से ज़्यादा 12 डिग्री होना चाहिए. इसके साथ ही उसके नेविगेशन गाइडेंस, फ्लाइट की गति, साफ तस्वीरें और सतह भी ऐसी होनी चाहिए जहां लैंडिंग की जा सके.चंद्रमा पर उतरने के आखिरी 10 मिनट सबसे अहम होते हैं. उसी दौरान अभियान की हर चीज का सही काम करना जरूरी होता है. सॉफ्ट लैंडिग नियंत्रित रहे, जिसके लिए सही समय बेहद जरूरी होता है. लैंडर जब उतरता है तो तेजी से हिल सकता है जिस पर नियंत्रण बना कर रखना होता है. इसके अलावा चांद के गुरुत्वाकर्षण और उसकी सतह पर बने क्रेटर भी मुश्किल बढ़ाते हैं.
धरती से तीन लाख 84 हजार किलोमीटर दूर सही वक्त पर इनपुट पहुंचाना भी बेहद अहम होता है.क्या हैं चुनौतियांसही समय और सही स्पीड है जरूरीलैंडर के गिरने और कंपन की गति को करना होता है कंट्रोलगुरुत्वाकर्षण भी है चुनौतीचांद के क्रेटर और रेजोलिथइनपुट पहुंचने में देरी भी लैंडिंग को बनाता है मुश्किलऔर इससे निपटने के लिए चंद्रयान 3 में वो सारी तैयारी की गईं हैं जिससे इसे आसानी से उतारकर मकसद हासिल किया जा सके. इस सबके लिए नई तकनीक भी विकसित की गई है .
चंद्रयान 3 में क्यालेज़र और RF ऑल्टीमीटरलेजर डॉप्लर वेलोसीमीटर और लैंडर हॉरिजॉन्टल वेलोसिटी कैमरालेजर जायरो आधारित इनर्शियल रेफेरेंसिंग और एक्सेलोरोमीटर पैकेजप्रोपॉल्शन सिस्टम: 800N लिक्विड इंजन, 58N एट्टीट्यूड थ्रस्टर, इंजन नियंत्रित करने के उपकरणनैविगेशन, गाइडेंस और कंट्रोल के लिए हार्डवेयर और सॉफ्टवेयरखतरा भांपने के लिए कैमरा और एल्गोरिथमनए लैंडिंग मैकेनिज्म
