नई दिल्ली:- सरसों की खेती भारत में काफी लोकप्रिय है। सरसों का तेल और सरसों का साग दोनों ही हमारे भोजन का अहम हिस्सा हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि सरसों की एक ऐसी नई किस्म है, जिसके पौधे की लंबाई 7 फिट तक होती है और एक ही पौधे से 10 किलो सरसों की पैदावर होती है? यह सच है। इस नई किस्म का नाम है पूसा मस्टर्ड-32। इस किस्म को भारतीय कृषि अनुसंधान संस्था पूसा ने विकसित किया है। यह सरसों की पहली एकल शून्य किस्म है, जिसमें सफेद रतुआ रोग का कोई खतरा नहीं है। इस किस्म की खेती पश्चिम बंगाल में की जा रही है, जहां किसानों को इससे बहुत फायदा हो रहा है।
सरसों की नई किस्म के फायदे
सरसों की नई किस्म पूसा मस्टर्ड-32 के कई फायदे हैं। इस किस्म की खेती करने के लिए बीज की ज्यादा आवश्यकता नहीं होती है। सिर्फ 100 ग्राम सरसों बीज से आप 1 बीघे में खेती कर सकते हैं। इस किस्म में तेल की मात्रा भी बेहतर है। इसमें तेल की मात्रा 37 प्रतिशत है, जबकि सामान्य सरसों में यह 30 प्रतिशत होती है। इस किस्म से प्रति हैक्टेयर 25 क्विंटल तक पैदावार दे सकती है। इससे किसानों को प्रति हैक्टेयर करीब 1.16 लाख रुपए की कमाई हो सकती है। इसके अलावा, इस किस्म का उपयोग पशु चारे के रूप में भी किया जा सकता है, क्योंकि इसमें ग्लूकोसिनोलेट की मात्रा बहुत कम है।
सरसों की नई किस्म की खेती कैसे करें
सरसों की नई किस्म पूसा मस्टर्ड-32 की खेती करने के लिए आपको कुछ बातों का ध्यान रखना होगा। इस किस्म की बुआई का समय अक्टूबर के पहले सप्ताह से नवंबर के पहले सप्ताह तक है। इस किस्म की बुआई के लिए जमीन को अच्छी तरह से तैयार करना होगा। जमीन को दो बार हल चलाकर बारीक करना होगा। बीज को बुआई से पहले फंगसाइड से छिड़कना होगा। बीज को 2.5 सेंटीमीटर की गहराई पर बुआई करना होगा। बुआई के बाद जमीन को हल्का सा दबाना होगा। बुआई के बाद जमीन को नम रखना होगा।
बुआई के 25 दिन बाद फॉस्फोरस और पोटैशियम का उर्वरक देना होगा। बुआई के 45 दिन बाद नाइट्रोजन का उर्वरक देना होगा। बुआई के 60 दिन बाद फिर से नाइट्रोजन का उर्वरक देना होगा। बुआई के 75 दिन बाद फॉस्फोरस और पोटैशियम का उर्वरक देना होगा। बुआई के 90 दिन बाद फिर से नाइट्रोजन का उर्वरक देना होगा। सरसों की खेती में पानी की ज्यादा जरूरत नहीं होती है।
