नई दिल्ली :- इस क्षेत्र में अविभाजित शिवसेना 1989 से ही ‘खान या बान’ का नारा देकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे यहां से लोकसभा चुनाव जीतती आई है। इस बीच सिर्फ एक बार 1998 में कांग्रेस यहां से जीत सकी थी।
मगर अब विभाजन के बाद शिवसेना के हाथ से उसका चुनाव चिह्न निकलकर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के पास जा चुका है। साथ ही, महाविकास आघाड़ी का हिस्सा बनने के बाद उद्धव ठाकरे की हिंदुत्वनिष्ठ विचारधारा पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। ऐसे में परभणी के बहुसंख्यक मतदाता इस बार किसके साथ खड़े होंगे, ये सवाल बना हुआ है।
परभणी जिला महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र का हिस्सा है। आजादी से पहले पूरा मराठवाड़ा हैदराबाद के निजाम की रियासत की हिस्सा था। परभणी में 24 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम आबादी है। यही कारण है कि 1985 के बाद जब शिवसेना प्रमुख बालासाहब ठाकरे ने हिंदुत्व की राजनीति शुरू की, तो मुंबई के बाहर मराठवाड़ा में ही अपना विस्तार करना शुरू किया।
शिवसेना ने भाजपा के साथ सीटों के बंटवारे में मराठवाड़ा की ही ज्यादा सीटें लीं। उनमें परभणी की भी एक सीट थी, जहां से 1989 में पहली बार शिवसेना के अशोकराव देशमुख चुनकर आए। हालांकि उस समय तक शिवसेना को उसका चुनाव चिह्न ‘धनुष-बाण’ नहीं मिला था, इसलिए अशोकराव देशमुख निर्दलीय ही चुनकर आए थे। लेकिन जब शिवसेना को उसका चुनाव चिह्न ‘धनुष-बाण’ मिल गया, तो उसने परभणी में ‘खान या बान’ का नारा देना शुरू कर दिया।
परभणी की हिंदू आबादी शिवसेना के पक्ष में मतदान करती रही और 1998 का एक चुनाव छोड़कर वह लगातार यहां से जीतती भी रही। शिवसेना ने इस बार भी अपने दो बार के सांसद संजय जाधव को ही अपना उम्मीदवार बनाया है। लेकिन अब समीकरण बदल चुके हैं। अब शिवसेना में विभाजन के बाद शिवसेना के हाथ से उसका चुनाव चिह्न धनुष-बाण निकल चुका है।अब तो शिवसेना के परभणी कार्यालय में मुस्लिम कार्यकर्ता भी अच्छी संख्या में दिखाई देते हैं। तो सवाल खड़ा होने लगा है कि अब तक उसके साथ रहा हिंदू मतदाता इस बार शिवसेना का नया चुनाव चिह्न ‘मशाल’ उठाकर चलेगा क्या.
