नई दिल्ली:– बांग्लादेश में नई राजनीतिक परिस्थितियों के बीच भारत और ढाका के रिश्तों में सुधार के संकेत दिख रहे हैं। हालिया कूटनीतिक कार्यक्रमों और संवादों ने दोनों देशों के बीच आई असहजता को कम किया है। शेख हसीना मुद्दे और पिछले तनाव के बावजूद नई दिल्ली बदले हालात के अनुसार रणनीति बना रही है, जबकि आगामी विदेश मंत्री की भारत यात्रा से रिश्तों में नई उम्मीदें जुड़ी हैं।
बांग्लादेश के नेशनल डे पर बीते दिनों सामने आई यह तस्वीर पड़ोसी देश के साथ संबंधों में यू-टर्न की गवाह बनी। इस तस्वीर में बांग्लादेश के राजदूत रियाज हमीदुल्लाह, भारत के विदेश राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह और विदेश सचिव विक्रम मिस्री की बॉडी लैंग्वेज में जो दिख रहा है, उसे द्विपक्षीय संबंधों में ‘सहजता’ कहते हैं। कुछ महीनों पहले तक हाई कमीशन में ऐसी तस्वीर की कल्पना नहीं की जा सकती थी।
भारत ने बदले हुए बांग्लादेश के लिए अपने आपको तैयार किया
तारिक रहमान ने व्यावहारिकता को रखा है आगे
बांग्लादेश के विदेश मंत्री की भारत यात्रा से बहुत उम्मीदें
बदल रहा माहौल: ढाका में नई सरकार आने के बाद हुए इस कार्यक्रम में जहां पुचका डिप्लोमेसी दिखी, तो राजदूत ने अपने भाषण में गायक जुबीन गर्ग का जिक्र किया, उनकी आवाज को सरहद के आर-पार का पुल बताया। तीन महीने पहले बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमलों के विरोध में यहां विरोध प्रदर्शन हुआ था। उस दौरान ढाका में भी भारतीय मिशन के बाहर नारेबाजी और विरोध ने दिल्ली को चिंता में डाला था। लेकिन, अब पूरब से आने वाली कूटनीतिक हवा से बदली फिजा को महसूस किया जा सकता है।
हसीना का मुद्दा: किसी देश के राजनीतिक तापमान का असर किस तरह उसकी विदेश नीति पर पड़ता है, बांग्लादेश इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। अगस्त 2024 से दिल्ली के लुटियंस के एक ‘सेफ’ हाउस में रह रहीं शेख हसीना के मुद्दे को यूनुस प्रशासन ने बार-बार द्विपक्षीय रिश्तों का डेंजर जोन बनाया। कई बार ढाका की ओर से हसीना के प्रत्यर्पण की मांग उठाई गई।
गलतियों से सबक: इस संदर्भ में बीते साल नवंबर में मौजूदा विदेश मंत्री और उस वक्त राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे खलीलुर रहमान की भारत यात्रा को संबंधों में आए ठंडेपन को दूर करने की एक कोशिश की तरह देखा गया। इस दौरे से बांग्लादेश ने नए सिरे से इंगेजमेंट का संकेत दिया। हालांकि नवंबर में इस यात्रा के बाद चुनावी प्रचार और गर्मागर्मी में भारत विरोधी सुर भी सुने गए। हसीना के सत्ता से हटने के बाद के हालातों को पढ़ने और रिएक्ट करने में देरी की गलती भारत इस बार नहीं करना चाहता था। भारत इस बार बांग्लादेश चुनाव के बाद के हालात से निपटने के लिए तैयार था।
भारत की तैयारी: जमात हो या बीएनपी, बांग्लादेश में इलेक्शन के दौरान भारत सभी पक्षों के संपर्क में रहा। खालिदा जिया के इंतकाल के बाद संवेदना जाहिर करने के लिए खुद विदेश मंत्री जयशंकर ढाका गए थे। बांग्लादेश की दो ध्रुवीय राजनीति में से शेख हसीना की गैरमौजूदगी के बीच बनने वाले सियासी हालात के लिए भारत ने खुद को तैयार रखा। विदेश मंत्री और तारिक रहमान की मुलाकात इसका संकेत भर थी। इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था कि हसीना अब फिलहाल राजनीति के नेपथ्य में रहेंगी।
संकट में सहयोग: बांग्लादेश और भारत के बीच अब भी कई ऐसे मुद्दे हैं, जो असहज कर सकते हैं। बीएनपी की परंपरागत तौर पर पाकिस्तान से नजदीकी रही है, लेकिन नरसंहार दिवस पर पाक फौज को लेकर तारिक रहमान का बयान काफी कुछ कह गया। पश्चिम एशिया संकट के दौरान ऊर्जा आपूर्ति में सहयोग जैसे मुद्दों को नकारना बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देश के लिए भी आसान नहीं, जबकि दक्षिण एशिया के कई देश भारत की ओर नजर लगाए हैं।
नया मौका: इसी हफ्ते बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान भारत दौरे पर होंगे। एजेंडे में जल बंटवारे से लेकर तमाम तरह के मुद्दे हैं। भारत इस दौरे को रिश्तों में खुलेपन की तरह देखने की कोशिश करेगा, खासकर ऐसे वक्त जब अपनी मां की राजनीति से अलग तारिक रहमान ने अभी तक भारत को लेकर किसी तरह की नकारात्मकता नहीं दिखाई है। वैसे भी भारतीय डिप्लोमेसी बीते काफी समय से ढाका के साथ रिश्तों को सुधरी पिच पर लाने की कोशिश करती रही है।
