नई दिल्ली:– फिल्म ‘भूत बंगला’ के जरिए निर्देशक प्रियदर्शन और अभिनेता अक्षय कुमार (Akshay Kumar) की जोड़ी 14 साल बाद बड़े पर्दे पर (Bhooth Bangla Movie Review) लौटी है। इससे पहले दोनों ‘भूल भुलैया’, ‘हेरा फेरी’, ‘भागम भाग’ और ‘गरम मसाला’ जैसी सफल कॉमेडी फिल्में दे चुके हैं। इस बार भी उन्होंने कॉमेडी और हॉरर का मिश्रण पेश करने की कोशिश की है।
कहानी में मिथक और रहस्य का मेल
फिल्म की कहानी मंगलपुर नाम के एक गांव से शुरू होती है, जहां ‘वधूसुर’ नाम का राक्षस नई दुल्हनों को उठा ले जाता है। इसी डर के कारण वहां शादी करना मना है। कहानी आगे लंदन में रहने वाले अर्जुन आचार्या (अक्षय कुमार) के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे अपने दादा की एक श्रापित हवेली के बारे में पता चलता है।
अर्जुन अपनी बहन मीरा (मिथिला पालकर) की शादी उसी हवेली में कराने का फैसला करता है, जबकि गांव के लोग उसे चेतावनी देते हैं। कहानी में रहस्य तब गहराता है जब अर्जुन का सामना वधूसुर से होता है और उसके साथ एक अनोखा संबंध सामने आता है।
पहला हाफ कॉमेडी से भरपूर
फिल्म का पहला भाग काफी मनोरंजक है। असरानी, परेश रावल, राजपाल यादव और अक्षय कुमार की कॉमिक टाइमिंग दर्शकों को खूब हंसाती है। कई सीन और डायलॉग्स पुराने दौर की कॉमेडी फिल्मों की याद दिलाते हैं। इंटरवल तक सस्पेंस भी बना रहता है, जो दर्शकों को बांधे रखता है।
दूसरा हाफ थोड़ा कमजोर
दूसरे हाफ में फिल्म का टोन पूरी तरह हॉरर की ओर चला जाता है। हालांकि डर का तत्व मौजूद है, लेकिन कॉमेडी काफी कम हो जाती है। कई कलाकारों की मौजूदगी भी सीमित हो जाती है, जिससे फिल्म की रफ्तार प्रभावित होती है। क्लाइमैक्स दर्शकों को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाता और कुछ सवाल अनसुलझे रह जाते हैं।
स्क्रीनप्ले और तकनीकी पक्ष
फिल्म का स्क्रीनप्ले कमजोर नजर आता है। शुरुआत मजबूत होने के बावजूद अंत में कहानी उलझती हुई महसूस होती है। कुछ घटनाओं का तार्किक आधार स्पष्ट नहीं हो पाता। हालांकि, प्रियदर्शन का निर्देशन और विजुअल इफेक्ट्स प्रभावशाली हैं।
सिनेमैटोग्राफी दिवाकर मणि ने संभाली है, जो फिल्म को विजुअली आकर्षक बनाती है। वहीं, प्रीतम का संगीत औसत रहा और गाने ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ते।
कलाकारों का प्रदर्शन
असरानी ने अपने अभिनय से सबसे ज्यादा प्रभावित किया, खासकर पहले हाफ में। परेश रावल और राजपाल यादव ने भी फिल्म में जान डाली। अक्षय कुमार का डबल रोल सराहनीय है और उनकी परफॉर्मेंस पुराने दौर की याद दिलाती है।
मिथिला पालकर और जिशु सेनगुप्ता ने भी अच्छा काम किया है। हालांकि, वामिका गब्बी का किरदार कमजोर रहा और उनका स्क्रीन प्रेजेंस प्रभावी नहीं बन पाया। तब्बू की एंट्री सीमित होने के बावजूद प्रभावशाली रही।
