नई दिल्ली :– महिला आरक्षण बिल के साथ परिसीमन (Delimitation) का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। संसद में जारी बहस के बीच सरकार का तर्क है कि आने वाले समय में लोकसभा सीटों की संख्या मौजूदा 543 से बढ़कर करीब 850 तक पहुंच सकती है। हालांकि सीटों में वृद्धि कोई नई बात नहीं है। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में यह प्रक्रिया कई बार हो चुकी है।
1952: 489 सीटों से शुरू हुआ सफर
भारत में पहला आम चुनाव 1951-52 के बीच आयोजित हुआ, जिसमें लोकसभा की 489 सीटों के लिए मतदान हुआ। उस समय देश की जनसंख्या, राज्यों की संरचना और प्रशासनिक आवश्यकताएं अलग थीं, इसलिए सीटों का निर्धारण भी उसी आधार पर किया गया।
1957 से 1962: धीरे-धीरे बढ़ोतरी
दूसरे आम चुनाव (1957) में सीटों की संख्या बढ़कर 494 हो गई। 1962 में यह संख्या स्थिर रही। यह वह दौर था जब राज्यों के पुनर्गठन और जनसंख्या वृद्धि के चलते प्रतिनिधित्व बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही थी।
1967: बड़ा विस्तार, 520 सीटें
1967 के आम चुनाव में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़कर 520 हो गई। यह बदलाव देश की बढ़ती जनसंख्या और राजनीतिक विविधता को समायोजित करने के लिए किया गया था।
1971-1977: उतार-चढ़ाव का दौर
1971 में सीटों की संख्या घटकर 518 रह गई, लेकिन 1977 में यह बढ़कर 542 हो गई। यह समय राजनीतिक और प्रशासनिक बदलावों का था, जिसका असर संसद की संरचना पर भी पड़ा।
1980: 543 सीटों का स्थायी आंकड़ा
1980 में लोकसभा सीटों की संख्या 543 तय की गई, जो आज तक बरकरार है। पिछले चार दशकों से देश की संसदीय व्यवस्था इसी आंकड़े पर आधारित है।
1976 का ‘फ्रीज’: बड़ा टर्निंग पॉइंट
1976 में सरकार ने परिवार नियोजन को बढ़ावा देने और राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए सीटों की संख्या पर ‘फ्रीज’ लगा दिया। पहले यह फ्रीज 2001 तक लागू था, बाद में इसे बढ़ाकर 2026 तक कर दिया गया, इसका मतलब यह हुआ कि जनसंख्या बढ़ने के बावजूद लोकसभा सीटों की संख्या नहीं बढ़ाई गई।
परिसीमन हुआ, पर सीटें नहीं बढ़ीं
हालांकि 1971 की जनगणना के आधार पर संसदीय क्षेत्रों की सीमाएं बदली गईं, लेकिन कुल सीटों की संख्या स्थिर रखी गई। इसका उद्देश्य राज्यों के बीच राजनीतिक संतुलन बनाए रखना था।
अब 850 सीटों की चर्चा क्यों?
2026 के बाद फ्रीज खत्म होने के साथ ही परिसीमन की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है। सरकार का कहना है कि जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व बढ़ाना जरूरी है। महिला आरक्षण लागू करने के लिए सीटों का विस्तार जरूरी हो सकता है, हालांकि दक्षिण भारत के राज्यों को आशंका है कि नई व्यवस्था में उनका प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।
क्या होगा आगे?
अगर लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ती है, तो यह छठी बार होगा जब संसद का आकार बदलेगा। यह सिर्फ सीटों की संख्या का मुद्दा नहीं, बल्कि राज्यों के बीच शक्ति संतुलन, लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और नीति निर्माण की दिशा, इन सभी पर इसका गहरा असर पड़ेगा। लोकसभा सीटों का इतिहास बताता है कि भारत का लोकतंत्र समय के साथ लगातार विकसित हुआ है। अब 2026 के बाद संभावित परिसीमन और सीट वृद्धि देश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव ला सकती है।
