छत्तीसगढ़:- विधानसभा में मुख्यमंत्री साय ने महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में एक-तिहाई आरक्षण देने का प्रस्ताव पेश किया, जिसे परिसीमन के बाद लागू करने की मांग की गई. विशेष सत्र में इस पर चर्चा हुई, हालांकि विपक्ष ने अपने प्रस्ताव को शामिल न किए जाने पर आपत्ति जताई और सदन में बहस भी हुई.
छत्तीसगढ़ विधानसभा में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने गुरुवार को एक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें मांग की गई कि परिसीमन प्रक्रिया पूरी होने के बाद संसद और सभी राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण तत्काल प्रभाव से लागू किया जाए. यह प्रस्ताव महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और उन्हें राजनीतिक रूप से अधिक सशक्त बनाने के उद्देश्य से लाया गया, जिस पर सदन में विस्तार से चर्चा भी की गई. सरकार का कहना है कि यह कदम महिलाओं की गरिमा और समान अवसर सुनिश्चित करेगा.
यह विशेष सत्र एक दिन के लिए केवल इसी मुद्दे पर चर्चा के लिए बुलाया गया था, क्योंकि लोकसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक पारित नहीं हो सका था. इस विधेयक में 2029 के चुनावों से पहले आरक्षण लागू करने और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव शामिल था. हालांकि, आवश्यक दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण यह विधेयक संसद में गिर गया, जिससे इस मुद्दे पर राज्यों में भी चर्चा शुरू हुई.
विधेयक के मुताबिक, 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन प्रक्रिया पूरी होने के बाद लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू किया जाना था. इसके तहत लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर अधिकतम 850 करने का भी प्रस्ताव रखा गया था, ताकि नई व्यवस्था को लागू किया जा सके. यह बदलाव 2029 के संसदीय चुनावों से पहले लागू करने की योजना थी, लेकिन संसद में पर्याप्त समर्थन न मिलने के कारण यह आगे नहीं बढ़ पाया.
केंद्र सरकार से अपील की
विधानसभा में चर्चा के दौरान विपक्ष के नेता चरण दास महंत ने भी इसी तरह का प्रस्ताव पेश करने की बात कही, जिसमें उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की कि मौजूदा सीटों की संख्या के भीतर ही महिलाओं को जल्द से जल्द 33 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए. हालांकि, उनका प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया गया, जिससे विपक्ष ने आपत्ति जताई और इसे नजरअंदाज करने का आरोप लगाया. इससे सदन में हल्की बहस और असहमति की स्थिति भी बनी.
विपक्ष प्रस्ताव अस्वीकार
स्पीकर रमन सिंह ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि यह विशेष सत्र पूरी तरह सरकारी कार्यवाही के लिए बुलाया गया था और एजेंडा पहले से तय था. इसलिए विपक्ष के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया जा सकता था. उन्होंने यह भी कहा कि सदन के नियमों के अनुसार ही कार्यवाही आगे बढ़ाई जाएगी और सभी सदस्यों को अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिलेगा, लेकिन निर्धारित विषय के भीतर ही चर्चा संभव है.
दोनों पक्षों में नोकझोंक
इस दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच हल्की नोकझोंक भी देखने को मिली, जहां दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क रखे. सरकार ने कहा कि महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए यह प्रस्ताव जरूरी है और परिसीमन के बाद इसे लागू किया जाना चाहिए. वहीं विपक्ष ने इसे जल्दबाजी में लिया गया फैसला बताया. बाद में स्पीकर ने सभी सदस्यों से संयम बनाए रखने और चर्चा को रचनात्मक दिशा में आगे बढ़ाने की अपील की
