नई दिल्ली:– मध्यपूर्व एशिया में जारी युद्ध और तनाव का असर अब सीधे भारत की अर्थव्यवस्था और आम जनता की जेब पर दिखाई देने लगा है। लगातार बढ़ती कच्चे तेल की कीमतों ने पेट्रोल-डीजल के दामों को लेकर देशभर में नई बहस छेड़ दी है। सवाल उठ रहा है कि आखिर कब तक जनता अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग टैक्स का बोझ उठाती रहेगी और क्या अब पेट्रोल-डीजल को GST के दायरे में शामिल करने का समय आ गया है?
पेट्रोलियम मंत्रालय की Petroleum Planning and Analysis Cell (PPAC) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक फरवरी 2026 में भारतीय बास्केट कच्चे तेल की कीमत 69.01 डॉलर प्रति बैरल थी, लेकिन मध्यपूर्व में पिछले 77 दिनों से जारी युद्ध और टकराव के कारण 14 मई 2026 तक इसकी कीमत बढ़कर 108.36 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई। यानी महज ढाई महीने में कच्चा तेल 39.35 डॉलर प्रति बैरल महंगा हो गया, जो करीब 57.02% की बढ़ोतरी है।
भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमतों का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों पर पड़ रहा है। तेल आयात का खर्च करीब 60% तक बढ़ चुका है, जिससे सरकारी तेल कंपनियों पर भारी दबाव बना हुआ है। इसी संकट को देखते हुए केंद्र सरकार ने 27 मार्च 2026 को पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 10 रुपये प्रति लीटर घटाने का फैसला किया था।
पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने उस समय कहा था कि सरकार के सामने दो विकल्प थे—या तो अंतरराष्ट्रीय कीमतों का पूरा बोझ जनता पर डाल दिया जाए, जैसा कई देशों ने किया, या फिर सरकार खुद राजस्व में कटौती कर नागरिकों को राहत दे। सरकार ने दूसरा रास्ता चुना और तेल कंपनियों के बढ़ते घाटे को कम करने के लिए टैक्स में कटौती की।
हालांकि, केंद्र सरकार की राहत के बावजूद राज्यों ने पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले VAT और सेल्स टैक्स में कोई बड़ी कटौती नहीं की। यही वजह है कि कई राज्यों में पेट्रोल की कीमतें अब भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि राज्यों की बड़ी कमाई पेट्रोलियम उत्पादों से होने वाले VAT और सेल्स टैक्स से होती है, इसलिए वे इसमें कटौती करने को तैयार नहीं हैं।
इंडियन ऑयल के आंकड़ों के अनुसार 1 अप्रैल 2026 को दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 94.77 रुपये प्रति लीटर थी, जिसमें राज्य सरकार का VAT हिस्सा 15.40 रुपये था। वहीं डीजल की कीमत 87.67 रुपये प्रति लीटर रही, जिसमें 12.83 रुपये VAT के रूप में शामिल थे।
देश में सबसे ज्यादा VAT लगाने वाले राज्यों में तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और ओडिशा शामिल हैं। तेलंगाना में पेट्रोलियम उत्पादों पर 35.20% VAT लगाया जा रहा है, जबकि आंध्र प्रदेश में 31% VAT के साथ अतिरिक्त टैक्स और रोड डेवलपमेंट सेस भी वसूला जाता है। दूसरी तरफ गुजरात, हरियाणा, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में VAT की दरें अपेक्षाकृत कम हैं।
मध्यपूर्व संकट के कारण बढ़ते ईंधन संकट के बीच नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू ने भी राज्यों से एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) पर VAT कम करने की अपील की थी, लेकिन महाराष्ट्र को छोड़कर ज्यादातर राज्यों ने इस दिशा में कोई पहल नहीं की।
अब एक बार फिर पेट्रोल-डीजल को GST के दायरे में लाने की मांग तेज हो गई है। यदि ऐसा होता है तो पूरे देश में ईंधन पर एक समान टैक्स व्यवस्था लागू हो सकती है, जिससे अलग-अलग राज्यों में कीमतों का अंतर खत्म होगा और संकट के समय सरकारें मिलकर टैक्स में राहत दे सकेंगी। हालांकि 2021 में GST काउंसिल की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई थी, लेकिन राज्यों के विरोध के कारण कोई सहमति नहीं बन पाई थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले समय में कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं तो पेट्रोल-डीजल को GST के दायरे में लाने का दबाव और तेज हो सकता है। फिलहाल जनता बढ़ती महंगाई और ईंधन कीमतों के बीच राहत का इंतजार कर रही है।
