नई दिल्ली:– देश में एक बार फिर ‘वंदे मातरम्’ राजनीतिक और वैचारिक बहस के केंद्र में आ गया है। केंद्र सरकार की नई गाइडलाइन, पश्चिम बंगाल में मदरसों और सरकारी स्कूलों में इसे अनिवार्य किए जाने के फैसले और इसके बाद मुस्लिम संगठनों व विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाओं ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय चर्चा बना दिया है। केंद्र सरकार और बीजेपी शासित राज्य इसे राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि कुछ मुस्लिम संगठन और विपक्षी नेता इसे धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा बता रहे हैं।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए हैं। गाइडलाइन के अनुसार प्रमुख सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत का गायन या वादन किया जाएगा और इसका आधिकारिक पूर्ण संस्करण प्रस्तुत होगा, जिसमें छह पद शामिल हैं। दोनों ‘वंदे मातरम्’ और ‘जन गण मन’ होने की स्थिति में पहले राष्ट्रगीत और बाद में राष्ट्रगान प्रस्तुत किया जाएगा। कार्यक्रम में मौजूद लोगों से सावधान मुद्रा में खड़े रहने की अपेक्षा की गई है। स्कूलों और कॉलेजों को सुबह की प्रार्थना सभा में इसे बढ़ावा देने की सलाह दी गई है। हालांकि सिनेमा हॉल में फिल्म के हिस्से के रूप में बजने पर खड़ा होना अनिवार्य नहीं होगा। केंद्र सरकार राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम 1971 में संशोधन पर भी विचार कर रही है, ताकि राष्ट्रगीत के सम्मान को लेकर स्पष्ट कानूनी प्रावधान बनाए जा सकें।
पश्चिम बंगाल में सरकार ने सभी मदरसों में प्रार्थना सभा के दौरान ‘वंदे मातरम्’ का गायन तत्काल प्रभाव से अनिवार्य कर दिया है। यह आदेश सरकारी मॉडल मदरसों, सहायता प्राप्त और गैर सहायता प्राप्त मान्यता प्राप्त मदरसों समेत अन्य शैक्षणिक संस्थानों पर लागू होगा। राज्य के अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा मंत्री खुदीराम टुडू ने कहा कि जब अन्य सरकारी स्कूलों में यह अनिवार्य है तो मदरसों में भी लागू किया जा सकता है।
इस फैसले के बाद राजनीतिक विवाद और तेज हो गया। बीजेपी नेताओं ने इसे राष्ट्रहित से जुड़ा कदम बताया, जबकि मुस्लिम संगठनों ने इसका विरोध किया। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ की कुछ पंक्तियां एकेश्वरवादी धार्मिक मान्यताओं से टकराती हैं और इसे अनिवार्य करना धार्मिक स्वतंत्रता पर असर डाल सकता है। वहीं कुछ मुस्लिम नेताओं ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ को लेकर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन ‘वंदे मातरम्’ के कुछ हिस्सों पर धार्मिक आधार पर मतभेद हैं।
दरअसल विवाद की जड़ गीत के उन हिस्सों को माना जाता है, जिनमें देवी स्वरूपों का उल्लेख है। ‘वंदे मातरम्’ की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी और यह उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा था। शुरुआती दो पदों को व्यापक स्वीकृति मिली हुई है, लेकिन बाद के पदों को लेकर वर्षों से विवाद बना हुआ है।
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया भी अलग-अलग रही। कुछ नेताओं ने इसे राष्ट्रवाद का प्रतीक बताया, जबकि विपक्ष ने कहा कि मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और अदालत के फैसले का सम्मान किया जाना चाहिए। अब केंद्र सरकार द्वारा कानूनी संशोधन की तैयारी और राज्यों में इसके बढ़ते अनिवार्य उपयोग के बीच ‘वंदे मातरम्’ का मुद्दा आने वाले समय में और बड़ा राजनीतिक तथा संवैधानिक विषय बन सकता है।
