नई दिल्ली:– अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल के महीनों में रिलायंस इंडस्ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी की जमकर तारीफ करते नजर आए हैं। उन्होंने दुनिया को बताया कि अंबानी ने एक अमेरिकी प्रोजेक्ट जिसका नाम ‘अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग’ है, उसमें 100 मिलियन डॉलर यानी लगभग 950 करोड़ रुपये का निवेश किया है। ट्रंप ने दावा किया कि अंबानी आगे इसमें और निवेश कर सकते हैं। इससे दोनों देशों का बड़ा फायदा होने वाला है।
एक तरह जहां ट्रंप इसे इतना बड़ा प्रोजेक्ट बता रहें हैं कि इससे अमेरिका की दिशा और दशा बदल सकती है। लेकिन इसी बीच एक रिपोर्ट आई है, जिसमें ट्रंप के दावे से उलट इसे प्रोजेक्ट को न सिर्फ एक घाटे वाला बताया गया है, बल्कि रिपोर्ट में यह तक कहा गया है कि ट्रंप जिस अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग की तारीफ करते नहीं थक रहे हैं वो शायद कभी शुरू ही नहीं होगा और निवेशकों का पैसे डूबने संभावनाएं अधिक है। ऐसे में सवाल आता है कि, अगर यह प्रोजेक्ट घाटे का सौदा होने वाला है तो फिर मुकेश अंबानी अपना अरबों रुपये इसमें क्यों लगा रहे है? अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग क्या है? और क्यों कहा जा रहा है कि ये शुरू ही नहीं होगा
अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक
आज दुनिया में सबसे अधिक कच्चा तेल निकालने वाला देश अमेरिका है। आमतौर पर लोग सऊदी अरब, रूस या इराक का नाम लेते हैं, लेकिन वर्तमान समय में तेल उत्पादन के मामले में अमेरिका सबसे आगे है। जिसे डोनाल्ड ट्रंप और बड़ा करना चाहते हैं, इसी कड़ी में उन्होंने 11 मार्च 2026 को टेक्सास में एक नई और बड़ी तेल रिफाइनरी परियोजना की घोषणा की गई। इस परियोजना का नाम “अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग” (AFR) बताया गया।
इस दौरान ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से रिलायंस इंडस्ट्रीज को धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि रिलायंस ने इस परियोजना में 100 मिलियन डॉलर यानी लगभग 950 करोड़ रुपये का निवेश किया है। ट्रंप के मुताबिक, यह निवेश अमेरिका में रोजगार और उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ भारत और अमेरिका के बीच व्यापार असंतुलन को कम करने में भी मदद करेगा। अब इसी प्रोजेक्ट और अंबानी के निवेश को लेकर न्यूयॉर्क स्थित गैर-लाभकारी और स्वतंत्र खोजी पत्रकारिता संस्थान प्रोपब्लिका ने अपनी एक रिपोर्ट पेश की है।
सवालों के घेरे में AFR कंपनी
प्रो-पब्लिका ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि AFR कोई मजबूत और स्थापित कंपनी नहीं है, बल्कि एक ऐसा स्टार्टअप है जो लंबे समय से निवेश जुटाने के लिए संघर्ष कर रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी के कई प्रोजेक्ट पहले भी शुरू होकर बंद हो चुके थे। इसके प्रमुख जॉन कैलसे का रिकॉर्ड भी विवादों से भरा बताया गया। उन पर पहले भी कई मुकदमे हो चुके हैं और उनकी कुछ कंपनियां दिवालिया भी हो चुकी हैं।
जांच में यह भी कहा गया कि AFR की वेबसाइट पर किए गए कई दावे सही नहीं पाए गए। कंपनी ने दावा किया था कि उसके पास सिंगापुर और नीदरलैंड में तेल भंडारण सुविधाएं हैं और 850 से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं। लेकिन रिपोर्ट के अनुसार इन दावों का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला। वेबसाइट पर दिए गए कुछ फोन नंबर या तो बंद थे या उनका संबंध किसी अन्य व्यवसाय से था।
AFR में ट्रंप परिवार की भूमिका क्या है?
माना जाता है कि AFR की किस्मत तब बदली जब इसमें डोनाल्ड ट्रंप के बड़े बेटे डोनाल्ड ट्रंप जनियर ने इसमें निवेश किया। हालांकि ट्रंप जनियर ने इसमें निवेश कब किया, इसे लेकर कोई स्पष्ट जानकारी किसी के पास नहीं है, लेकिन माना जा रहा है कि उन्होंने ट्रंप की घोषणा से पहले एक शेल कंपनी के जरिए गुप्त रूप से इसमें निवेश किया।
कंपनी ने ट्रंप जनियर के जुड़ते ही इसका प्रचार-प्रसार करना शुरू कर दिया। उन्होंने ट्रंप जूनियर के नाम का इस्तेमाल करके दूसरे निवेशकों को भी आकर्षित करने के लिए किया। कंपनी ने इसे दुनिया के सामने ऐसे पेश किया कि उनकी पहुंच न सिर्फ व्हाइट हाउस तक है बल्कि उसके अंदर ओवल ऑफिस (अमेरिकी राष्ट्रपति का ऑफिस) तक भी है।
मुकेश अंबानी AFR में क्यों निवेश कर रहे हैं?
रिपोर्ट के अनुसार, AFR में रिलायंस इंडस्ट्रीज और अंबानी परिवार का नाम सबसे पहले साल नवंबर 2025 में सामने आया था। इस समय ट्रंप जूनियर भारत दौरे पर आए थे, जहां उनकी मुलाकात मुकेश अंबानी के छोटे बेटे अनंत अंबानी से हुई थी। जहां अनंत ने चिड़ियाघर (वंतारा) में कुछ दिन बिताए थे। माना जा रहा है कि इसी दौरान ट्रंप जूनियर ने AFR के बारे में बताया और निवेश करने का ऑफर दिया। इसके बाद रिलायंस ने एक बड़ा फैसला करते हुए AFR में निवेश करने और वहां बनने वाले लगभग 80 प्रतिशत उत्पाद खरीदने का निर्णय लिया। इस फैसले ने दुनियाभर के लोगों को हैरानी में डाल दिया। क्योंकि रिलायंस पहले से ही दुनिया की सबसे बड़ी ऑयल रिफाइनरी की मालिक है, जो गुजरात के जामनगर में स्थित है।
प्रो-पब्लिका की रिपोर्ट के मुताबिक, रिलायंस ने AFR में निवेश केवल बिजनेस बढ़ाने के लिए नहीं किया, बल्कि इसका मकसद ट्रंप की टैरिफ की मार से बचने के लिए किया है। दरअसल यूक्रेन-रूस युद्ध के चलते भारत ने लंबे समय तक रूस से सस्ता तेल खरीदा और उसे दुनियाभर में बेचकर मोटा मुनाफा कमाया। जब तक अमेरिका में जो बाइडेन की सरकार थी तब तक उन्हें भारत और रूस के इस तेल व्यापार से कोई परेशानी नहीं थी। लेकिन जब 20 जनवरी, 2025 को डोनाल्ड ट्रंप दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने उन्होंने भारत पर इसे लेकर रोक लगा दी।
भारतीय बिजनेसमैन पर बनाया दबाव
इसके बाद जब ट्रंप रूस और यूक्रेन का युद्ध रुकवाने में असफल रहे, तो उन्होंने इसके लिए भारत पर जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया। ट्रंप के करीबी सलाहकार पीटर नवारो ने यह आरोप लगाया कि क्योंकि भारत रूस से तेल खरीदता है, इससे रूस आर्थिक रूप से लगातार मजबूत हो रहा है। जिसके चलते रूस को युद्धविराम के लिए मजबूर कर पाना मुश्किल हो रहा है।
नवारो ने सीधे तौर पर इसके लिए भारत और भारतीय बिजनेसमैन को जिम्मेदार बताया। उन्होंने कहा कि भारत अपने मुनाफे के लिए रूस-यूक्रेन युद्ध को आर्थिक बढ़ावा दे रहा है। हालांंकि, नवारो ने किसी का नाम नहीं लिया था लेकिन उनका निशाना देश के दो सबसे बड़े बिजनेस समुह अंबानी और अडानी पर ही था। रिपोर्ट के मुताबिक, अंबानी समूह ने इसी के चलते अमेरिका के साथ ‘क्विड प्रो क्वो’ समझौता किया है।
‘क्विड प्रो क्वो’ क्या है?
कानूनी और राजनीतिक भाषा में क्विड प्रो क्वो का अर्थ होता है, ‘कुछ पाने के बदले कुछ देना’। दूसरे शब्दों में, किसी लाभ के बदले दूसरा लाभ देना। प्रो-पब्लिका की रिपोर्ट का मुख्य दावा यही है कि रिलायंस का 100 मिलियन डॉलर का निवेश सिर्फ एक नहीं थी, बल्कि इसके बदले में कुछ नीतिगत राहत हासिल की गई।
टैरिफ में कमी: रिपोर्ट के अनुसार, निवेश की घोषणा के बाद भारत पर लगाए गए कुछ अतिरिक्त आर्थिक प्रतिबंधों में राहत दी गई। आलोचकों का कहना है कि यह महज संयोग नहीं हो सकता।
वेनेजुएला से तेल आयात की अनुमति: फरवरी 2026 में रिलायंस को वेनेजुएला से तेल आयात करने की अनुमति मिलने की खबर सामने आई। अमेरिका के प्रतिबंधों के कारण पहले यह प्रक्रिया काफी जटिल मानी जाती थी, इसलिए इस अनुमति को भी निवेश से जोड़कर देखा गया।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अमेरिकी प्रशासन के कुछ अधिकारी पहले भारतीय कंपनियों की आलोचना कर रहे थे, लेकिन बाद में उनकी कंपनियां AFR परियोजना से जुड़ गईं। इस बदलाव को भी आलोचक सवालों के घेरे में रख रहे हैं। माना जा रहा है कि अंबानी के बाद इसमें कुछ और समूह भी शामिल हो सकते हैं। जिसमें पहला नाम अडानी समूह का हो सकता है। हालांकि, इसे लेकर कुछ भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता है।
