मध्यप्रदेश:– सियासत में अक्सर एक पुरानी कहावत सही साबित होती है कि चुनाव केवल पार्टी के चुनाव चिन्ह पर नहीं, बल्कि जमीनी नेताओं और कार्यकर्ताओं के दम पर जीते जाते हैं। किसी भी कद्दावर नेता को साइडलाइन करके केवल संगठन के भरोसे चुनाव जीतने का भ्रम कई बार महंगा पड़ जाता है। मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव में भी कुछ इसी तरह की बात देखने को मिली है।
दतिया विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी कुंवर घनश्याम सिंह ने बंपर जीत दर्ज की है, वहीं बीजेपी के उम्मीदवार आशुतोष तिवारी को करारी हार मिली है। दतिया के चुनावी नतीजों के सामने आते ही बुंदेलखंड से लेकर भोपाल तक सियासी गलियारों में एक ही सवाल उठ रहा है कि क्या पूर्व गृहमंत्री और तीन बार के विधायक डॉ नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटना बीजेपी की भूल साबित हुई है। नवभारत के सीनियर डजिटल एडिटर शैलेंद्र तिवारी ने दतिया में बीजेपी की हार के 5 बड़े कारण बताए हैं…
- नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटना और कार्यकर्ताओं की नाराजगी
दतिया की राजनीति में तीन बार विधायक रह चुके वरिष्ठ भाजपा नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा का लंबे समय से मजबूत प्रभाव रहा है। इस उपचुनाव में भाजपा ने उनका टिकट काटकर अपेक्षाकृत नए चेहरे आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया। प्रत्याशी घोषित होते ही नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन और चक्काजाम किया। हालांकि, बाद में पार्टी नेतृत्व के हस्तक्षेप के बाद नरोत्तम मिश्रा ने सार्वजनिक रूप से आशुतोष तिवारी के समर्थन में प्रचार भी किया, लेकिन शैलेंद्र तिवारी का मानना है कि उनका बड़ा समर्थक वर्ग नए उम्मीदवार को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाया। इसका असर चुनावी नतीजों में भी देखने को मिला। - असंतुष्ट वोटरों का कांग्रेस को समर्थन
जीत के बाद कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह ने कहा कि पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने व्यक्तिगत तौर पर उनका कोई सहयोग नहीं किया। हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि टिकट कटने से नाराज भाजपा कार्यकर्ताओं के एक वर्ग ने कांग्रेस का समर्थन किया। शैलेंद्र तिवारी बताते हैं कि भाजपा के असंतुष्ट वोटरों की इस साइलेंट वोटिंग ने कांग्रेस की जीत का रास्ता आसान बना दिया। - कांग्रेस का मजबूत उम्मीदवार बना जीत की बड़ी वजह
कांग्रेस ने दतिया राजघराने से जुड़े पूर्व विधायक कुंवर घनश्याम सिंह को मैदान में उतारा। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में उनकी अच्छी पकड़ और सहज छवि का पार्टी को लाभ मिला। कांग्रेस ने राजेंद्र भारती के परिवार से किसी को टिकट देने के बजाय सर्वसम्मति से घनश्याम सिंह पर भरोसा जताया। शुरुआत में कुछ नाराजगी की चर्चाएं जरूर रहीं, लेकिन चुनाव परिणामों पर उसका कोई खास असर नहीं पड़ा। - नया बनाम पुराना चेहरा
दतिया की राजनीति लंबे समय से नरोत्तम मिश्रा के इर्द-गिर्द केंद्रित रही है। संगठन में सक्रिय होने के बावजूद आशुतोष तिवारी की आम जनता के बीच पहचान सीमित थी। ऐसे में एक स्थापित नेता की जगह अपेक्षाकृत नए चेहरे को उम्मीदवार बनाए जाने से कई मतदाता और कार्यकर्ता पूरी तरह जुड़ नहीं सके। शैलेंद्र तिवारी का मानना है कि इस कारण मुकाबला धीरे-धीरे कांग्रेस के पक्ष में झुक गया। - मतदान प्रतिशत में गिरावट
2023 के विधानसभा चुनाव में दतिया सीट पर करीब 80.2 प्रतिशत मतदान हुआ था, जबकि उपचुनाव में यह घटकर 71.44 प्रतिशत रह गया। यानी करीब 9 प्रतिशत मतदान कम हुआ। माना जा रहा है कि टिकट कटने से नाराज भाजपा के कुछ समर्थक और कोर वोटर मतदान के लिए घरों से नहीं निकले। मतदान प्रतिशत में आई इस गिरावट का फायदा कांग्रेस को मिला और वह सीट जीतने में सफल रही।
