छत्तीसगढ़:- कई इलाकों में इस बार स्वतंत्रता दिवस का नजारा कुछ अलग देखने को मिला है. जिन जगहों पर सालों से राष्ट्रीय पर्व खुलकर नहीं मना पाता थे, वहां अब पहली बार तिरंगा पूरे सम्मान के साथ फहराया गया. इस बार बस्तर संभाग के 93 गांवों में आजादी के 79 साल बाद तिरंगा फहराया गया है. बस्तर के 93 गांवों में बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं ने मिलकर राष्ट्रगान भी गाया. इस दौरान लोगों के चेहरों पर खुशी भी साफ झलकती नजर आई. यहां पर लंबे समय तक हिंसा, डर का माहौल के बीच रहने वाले इन गांवों में यह दिन सिर्फ स्वतंत्रता दिवस ही नहीं, बल्कि यहां के लोगों के लिए नई जिंदगी की शुरुआत जैसी महसूस हो रही है. चलिए आज हम आपको इन गांवों के बारे में बताते हैं, जहां पर पहली बार तिरंगा फहराया गया है. इसके साथ-साथ यहां पर तिरंगा अभी तक क्यों नहीं फहराया जाता था, इसके बारे में भी विस्तार से बताते हैं.
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में लगभग 92 गांवों में आजादी का पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया गया है. यहां पर 79 साल बाद तिरंगा फहराया गया है. इस ऐतिहासिक पल के गवाह बस्तर संभाग के सात जिलों में से तीन जिले बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर के लोग साक्षी बने हैं. इनमें बीजापुर के लगभग 33 गांव, सुकमा के 50 गांव, नारायणपुर के 9 गांवों में पहली बार स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम का आयोजन किया गया. इन गांवों में तिरंगा फहराना तो दूर, यहां पर पहुंचना भी आसान नहीं था. जंगल, खराब रास्ते और नक्सलियों के गढ़ होने के चलते प्रशासन की मौजूदगी बहुत ही कम रहती थी. लेकिन इस बार गांवों में झंडा फहराने के साथ अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए हैं. इतना ही नहीं इन कार्यक्रमों में बच्चों ने देशभक्ति गीत गाए, ग्रामीणों ने मिठाईंया भी बांटी. यहां के लोगों के लिए यह सिर्फ कार्यक्रम नहीं, बल्कि यहां की बदलती तस्वीर उनके लिए काफी खास थी.
दशकों तक क्यों नहीं फहरा?
आजादी के इतने सालों तक यहां पर तिरंगा नहीं फहर पाने की सबसे बड़ी वजह नक्सली हिंसा थी. क्योंकि इन इलाकों में नक्सलियों का काफी दबदबा रहता था. सुकमा, बीजापुर, अबूझमाड़ जैसे अंदरूनी इलाकों में कई सालों तक प्रशासन की पहुंच नहीं रहती थी. इसकी वजह से यहां के लोगों में नक्सलियों का काफी डर का माहौल था. यहां माओवादी राष्ट्रीय उत्सवों का काफी विरोध करते थे. कई जगहें ऐसी हैं, जहां पर लोगों को खुले तौर पर कार्यक्रम करने से रोकते थे. गांव के लोग जान के जाने की डर से चुप रहते थे. सुरक्षा सिविर नहीं होने के चलते सरकारी कर्मचारी भी नियमित रूप से नहीं पहुंच पाते थे. यही वजह रही है कि स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व आसानी से नहीं मनाए जा सके. इसी वजह से आजादी के बाद से अब तक इस माहौल में रहे.
अब कैसे फहराया गया तिरंगा?
दरअसल, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने 24 अगस्त 2024 को सभी राज्यों के डीजीपी के साथ बैठक की थी, उस बैठक में गृहमंत्री ने देश से नक्सलवाद को पूरी तरह खत्म करने के लिए 31 मार्च 2026 की डेडलाइन तय की थी. हालांकि, तय समय से पहले प्रदेश से नक्सलवाद ने घुटने टेक दिए थे और मई 2026 में देश को नक्सलवाद से मुक्त घोषित कर दिया गया. नक्सलमुक्त प्रदेश बनाने में सबसे बड़ा योगदान सुरक्षाबलों का हाथ रहा है. क्योंकि उन्होंने पिछले कुछ सालों में अंदरूनी इलाकों में लगातार अभियान चलाए. इनमें छत्तीसगढ़ पुलिस, सीआरपीएफ, कोबर, डीआरजी और बस्तर फाइटर्स ने मिलकर कई दुर्गम इलाकों में पहुंच बनाई. नए सुरक्षा कैंप बनने के बाद नक्सलियों की गतिविधिया सीमित हुईं, जिससे ग्रामीणों का डर भी धीरे-धीरे कम होने लगा. इन इलाकों में खुफिया जानकारी के मुताबिक, अभियान चलाए गए और जंगलों में बिछाए गए बारूदी सुरंगों को भी हटाया गया. साथ ही कई नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर सामान्य जीवन अपनाया. इन प्रयासों के बाद गांवों में प्रशासन का भरोसा बढ़ा और लोग खुलकर राष्ट्रीय पर्वों में हिस्सा लेने लगे हैं.
ताड़मेटला जैसे इलाकों में बदलाव
एक समय ऐसा था कि नक्सली हिंसा के लिए पहचाने जाने वाले ताड़मेटला, सिलगर, टेकलगुड़ेम, धरानी बोदली और एर्राबोर जैसे इलाके अब धीरे-धीरे बदलते नजर आ रहे हैं. जिन जगहों पर कभी गोलियों की आवाज और दहशत का माहौल रहता था, वहां अब तिरंगा शांति और भरोसे की पहचान बन रहा है. यहां के ग्रामीणों का कहना है कि पहले बच्चे भी राष्ट्रीय पर्वों के कार्यक्रमों में खुलकर बात नहीं करते थे. इस बार गांव के लोग खुद इन कार्यक्रमों में शामिल हुए. इतना ही नहीं यहां के बुजुर्गों ने इसे अपने जीवन का खास दिन बताया. स्थानीय लोगों के लिए यह बदलाव सिर्फ झंडा फहराने तक सीमित नहीं, बल्कि सामान्य और सुरक्षित जीवन की उम्मीद से जुड़ा हुआ है.
नियद नेल्ला नार’ की क्या भूमिका
इन गांवों में राष्ट्रीय पर्व आयोजन में ‘नियद नेल्ला नार’ योजना की भी अहम भूमिका रही है. इसके तहत नक्सली इलाकों के आदिवासी गांवों में सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी जरूरी मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने का काम किया गया. इसे दक्षिण बस्तर की दंडामी बोली में इसका मतलब ‘आपका अच्छा गांव’ होता है. इस योजना से सुरक्षा कैंपों के आसपास बसे गांवों को विकास से जोड़ने पर खास ध्यान दिया गया. मोबाइल नेटवर्क, बस सेवा और सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने से लोगों का भरोसा बढ़ा. अब ग्रामीणों का कहना है कि जब गांव में सुविधाएं आने लगी, तब उन्हें लगा कि सरकार सच में उनके दरवाजे तक पहुंच रही हैं.
अब क्या बदलाव देखने को मिला?
इन इलाकों में बदलाव सुरक्षा की दृषि से देखा जाए, यहां के लोगों में डर का माहौल कम हुआ है. इसकी सबसे बड़ी वजह है कि यहां पर नए सुरक्षा कैंप बनाए गए हैं. नए कैंप बनाए जाने से इन इलाकों में प्रशासन का भी जुड़ाव बढ़ा है. अब गांवों तक सरकारी कर्मचारी, स्वास्थ्य दल और विकास योजनाएं नियमित रूप से पहुंचने लगी है. जहां पर पहले स्वतंत्रता दिवस के दौरान सन्नाटा रहता था, वहां अब राष्ट्रगान और वंदे मातरम की आवाज गूंज रही है. लोगों को लगा कि वे भी देश के बाकी हिस्सों की तरह राष्ट्रीय पर्व मना सकते हैं. प्रशासन का कहना है कि अब संविधान और सरकारी व्यवस्था गांवों के आखिरी छोर तक पहुंच रही है. यही बदलाव 93 गांवों में तिरंगा फहराने की सबसे बड़ी वजह बना.
आगे विकास को मिलेगी रफ्तार
इस तरह के कार्यक्रमों के होने से इन गांवों के लिए विकास की नई राह बनी है. क्योंकि इन कार्यक्रमों में विधायक, सांसद से लेकर मंत्री पहुंचे हैं. जहां पर उन्होंने विकास का वादा किया है. वहीं इसको लेकर प्रशासन का कहना है कि अब सड़क, बिजली, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं भी तेजी से पहुंचाई जाएंगी. इंदरूनी जंगली इलाकों में मोबाइल नेटवर्क, बस सेवा बेहतर होने से लोगों का संपर्क शहरों से बढ़ेगा. स्थानीय युवाओं को रोजगार और पढ़ाई के ज्यादा मौके मिलेंगे. महिलाएं भी बिना डर के अपने कामकाज कर सकेंगी. दशकों तक मुख्यधारा से कटे रहे गांवों में धीरे-धीरे सामान्य जीवन लौट रहा है. लोगों को उम्मीद है कि आने वाले समय में उनके गांव में और तेजी से विकास होगा.
योजनाओं का मिलेगा सीधा लाभ
‘नियद नेल्ला नार’ योजना की एक और सबसे बड़ी खासियत है कि इसके माध्यम से इन गांवों में बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने का काम लगातार जारी है. सुरक्षा कैंपों के आसपास बसे गांवों को सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा से जोड़ा जा रहा है. पात्र परिवारों को राशन कार्ड, आयुष्मान स्वास्थ्य सुविधा, उज्ज्वला योजना का लाभ और वन अधिकार पत्र देने की प्रक्रिया भी तेज की गई है. अंदरूनी गांवों में मोबाइल टावर और पक्के रास्ते बनने से लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी आसान हो रही है. ग्रामीणों का कहना है कि पहले छोटी जरूरतों के लिए भी कई किलोमीटर जाना पड़ता था, लेकिन अब गांव में ही सुविधाएं मिलने लगी हैं और भरोसा बढ़ा है.
दंतेवाड़ा में भी मनाया गया जश्न
दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल क्षेत्र में भी स्वतंत्रता दिवस का उत्साह देखने को मिला. पुरंगेल, लोहागांव, बड़ेपल्ली, बेंगपाल और गुमलनार पंचायत के गिरसापारा में पहली बार खुले माहौल में तिरंगा फहराया गया. गांव के बच्चे सुबह से ही तैयार होकर कार्यक्रम स्थल पर पहुंच गए थे. महिलाओं और बुजुर्गों ने भी बड़ी संख्या में हिस्सा लिया. राष्ट्रगान के दौरान कई लोगों की आंखें नम हो गईं. ग्रामीणों ने कहा कि वर्षों बाद ऐसा दिन आया है जब वे बिना किसी डर के अपने गांव में राष्ट्रीय पर्व मना सके. लोगों के बीच मिठाइयां बांटी गईं और बच्चों ने देशभक्ति गीतों पर कार्यक्रम पेश किए.
नक्सलवाद का जानिए इतिहास?
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद की शुरुआत 1980 के दशक में बस्तर के घने जंगली इलाकों से मानी जाती है. नक्सलबाड़ी आंदोलन से निकली माओवादी विचारधार पहले आंध्र प्रदेश, तेलंगाना के अलाकों तक पहुंची. उसके बाद धीरे-धीरे तत्कालीन मध्य प्रदेश के बस्तर इलाके में सक्रिय होने लगी. वहीं जंगलों और दुर्गम इलाकों का फायदा उठाकर नक्सल संगठनों ने आदिवासी इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत बनाई. 1990 के दशक में इनकी गतिविधिया बढ़ी. इसके बाद 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद बस्तर के दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर और आसपास के इलाकों में नक्सल हिंसा तेज हो गई. साल 2004 में अलग-अलग माओवादी गुटों के विलय से बनने के बाद छत्तीसगढ़ नक्सली हिंसा का केंद्र बन गया. साल 2005 से 2010 के बीच सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच कई बड़े हमले हुए, जिसके चलते बस्तर लंबे समय तक देश के सबसे अधिक नक्सली इलाकों में शामिल रहा.
