कोरबा:– महिला एवं बाल विकास विभाग की पाली परियोजना में बच्चों, गर्भवती महिलाओं, शिशुवती माताओं और किशोरी बालिकाओं के लिए संचालित पूरक पोषण आहार योजना अब गंभीर सवालों के घेरे में है। रेडी टू ईट पोषण आहार की आपूर्ति और वितरण को लेकर सामने आए आरोपों ने विभागीय व्यवस्था की पोल खोलने के साथ ही कथित तौर पर इस पूरे सिस्टम से जुड़े अधिकारियों और बिचौलियों में भी हड़कंप मचा दिया है। आरोप है कि दर्ज हितग्राहियों के नाम पर स्वीकृत रेडी टू ईट की पूरी मात्रा जमीन पर नहीं पहुंच रही और कम मात्रा में वितरण कर शेष पैकेटों को कथित तौर पर अलग तरीके से खपाने तथा प्रति पैकेट कमीशन का खेल चल रहा है। मामला सामने आने के बाद अब इसे दबाने, खबर हटाने और दबाव बनाकर प्रकरण को मैनेज करने के कथित प्रयासों की चर्चाएं भी तेज हो गई हैं।
खबर बाहर आई तो अचानक हरकत में आया सिस्टम!
पाली परियोजना के पोड़ी, सिल्ली, लाफा, माखनपुर, सपलवा सहित कई सेक्टरों में बीते सप्ताह मंगलवार को रेडी टू ईट की आपूर्ति नहीं होने का मामला सामने आया था। बड़ी संख्या में हितग्राहियों को निर्धारित पोषण आहार नहीं मिलने की शिकायतों के बाद मामला सार्वजनिक हुआ। इसके बाद कथित तौर पर संबंधित सेक्टरों में आनन-फानन में रेडी टू ईट पहुंचाया गया। सवाल यही है कि यदि व्यवस्था पहले से दुरुस्त थी तो खबर सामने आने के बाद अचानक आपूर्ति में तेजी क्यों आई? और यदि स्टॉक उपलब्ध था तो हितग्राहियों को समय पर वितरण क्यों नहीं हुआ?
आधा पोषण आहार, बाकी पर कथित कमीशन का आरोप
विभागीय सूत्रों के अनुसार आरोप है कि कुछ आंगनबाड़ी केंद्रों में दर्ज हितग्राहियों की संख्या के अनुपात में पूरा रेडी टू ईट उपलब्ध कराने के बजाय कम मात्रा में पोषण आहार लेने की कथित व्यवस्था है। आरोप यह भी है कि शेष पैकेटों को बाजार में खपाने अथवा वापस करने का खेल चलता है और प्रति पैकेट करीब 10 रुपये तक कथित कमीशन दिए जाने की बात सामने आई है। इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन यदि जांच में यह सच साबित होता है तो यह सीधे उन बच्चों और महिलाओं के हिस्से के पोषण से जुड़ा गंभीर मामला होगा, जिनके नाम पर सरकार पैसा खर्च कर रही है।
हर महीने 20-22 लाख का भुगतान, साल में करोड़ों का हिसाब!
सूत्रों के अनुसार पाली परियोजना में रेडी टू ईट के लिए संबंधित समूह को हर महीने लगभग 20 से 22 लाख रुपये का भुगतान किए जाने की बात सामने आ रही है। यानी सालाना भुगतान करीब 2.40 से 2.64 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। ऐसे में मामला केवल कुछ पैकेटों की कमी का नहीं रह जाता। सवाल यह है कि शासन से करोड़ों रुपये का भुगतान होने के बाद उत्पादन से लेकर हितग्राही तक पहुंचने वाली पूरी श्रृंखला का वास्तविक हिसाब क्या है? कितनी मात्रा तैयार हुई, कितनी उठी, कितनी आंगनबाड़ी केंद्रों तक पहुंची और कितनी मात्रा वास्तव में हितग्राहियों को वितरित हुई—इन सभी बिंदुओं का मिलान जरूरी है।
कागजों में पूरा वितरण, जमीन पर आधा तो कौन जिम्मेदार?
यदि किसी केंद्र पर दर्ज हितग्राहियों के नाम पर पूरी मात्रा स्वीकृत और वितरित दिख रही है, लेकिन मौके पर स्टॉक कम मिलता है तो यह सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं मानी जा सकती। ऐसे में स्टॉक रजिस्टर, वितरण पंजी, समूह के उत्पादन रिकॉर्ड, परिवहन दस्तावेज और भुगतान रिकॉर्ड को एक साथ मिलाना होगा। बिना पूर्व सूचना के आंगनबाड़ी केंद्रों का भौतिक सत्यापन और वास्तविक हितग्राहियों से पूछताछ ही इस पूरे मामले की सच्चाई सामने ला सकती है।
परियोजना अधिकारी और सेक्टर सुपरवाइजर की निगरानी पर बड़ा सवाल
रेडी टू ईट की पूरी व्यवस्था केवल आपूर्तिकर्ता समूह के भरोसे नहीं चलती। परियोजना स्तर से लेकर सेक्टर और आंगनबाड़ी स्तर तक निगरानी की जिम्मेदारी तय है। फिर सवाल उठता है कि यदि कथित तौर पर लंबे समय से वितरण में अंतर था तो परियोजना अधिकारी और सेक्टर सुपरवाइजरों को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई? क्या स्टॉक रजिस्टर की नियमित जांच हुई? क्या वास्तविक हितग्राहियों से वितरण की पुष्टि की गई? क्या कभी अचानक निरीक्षण हुआ? यदि नहीं, तो निगरानी व्यवस्था की जिम्मेदारी कौन तय करेगा?
घोटाले की खबर से अधिकारियों और कथित दलालों में हड़कंप?
रेडी टू ईट मामले की खबरें सामने आने के बाद विभागीय व्यवस्था से जुड़े कुछ अधिकारियों और कथित बिचौलियों में हड़कंप मचे होने की चर्चाएं हैं। आरोप है कि मामला आगे बढ़ने से रोकने के लिए खबर हटाने, दबाव बनाने और संबंधित लोगों को मैनेज करने की कोशिशें की जा रही हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है, लेकिन यदि किसी शासकीय योजना में अनियमितता की शिकायत सामने आती है तो उसे दबाने के बजाय निष्पक्ष जांच कराना प्रशासन की जिम्मेदारी है। सवाल यह भी है कि आखिर किसे डर है कि जांच हुई तो क्या सामने आ जाएगा?
सिर्फ एक दिन की जांच से नहीं खुलेगा करोड़ों का राज
यदि प्रशासन वास्तव में मामले की तह तक जाना चाहता है तो केवल उस दिन की आपूर्ति की जांच पर्याप्त नहीं होगी, जब मामला मीडिया में आया। पिछले कई महीनों के रिकॉर्ड की आंगनबाड़ीवार जांच जरूरी है। दर्ज हितग्राहियों की संख्या, स्वीकृत मात्रा, उत्पादन, उठाव, परिवहन, भुगतान, स्टॉक और वास्तविक वितरण—हर स्तर पर रिकॉर्ड का मिलान होना चाहिए। इसके साथ यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि यदि किसी केंद्र पर निर्धारित मात्रा से कम रेडी टू ईट पहुंचा तो शेष मात्रा का क्या हुआ।
कथित कमीशन की रकम से लेकर भुगतान की पूरी चेन जांचे प्रशासन
यदि प्रति पैकेट कमीशन के आरोपों में सच्चाई है तो जांच एजेंसी को केवल आंगनबाड़ी स्तर तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह पता लगाना होगा कि पैसा किस स्तर पर तय होता था, किसके माध्यम से पहुंचता था और कथित कमीशन की पूरी श्रृंखला क्या थी। इसी के साथ आपूर्तिकर्ता समूह के बैंक भुगतान, बिल, उत्पादन क्षमता, कच्चे माल की खरीद, तैयार माल और परिवहन रिकॉर्ड का भी परीक्षण किया जाना चाहिए।
बच्चों के निवाले पर सवाल, अब जवाबदेही तय होनी चाहिए
जिस योजना का उद्देश्य कुपोषण से लड़ना है, उसमें यदि बच्चों के हिस्से का पोषण आहार कम किया गया और उसके नाम पर कमीशन का कथित खेल चला तो यह बेहद गंभीर आरोप है। सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है ताकि पोषण आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से वास्तविक हितग्राहियों तक पहुंचे। ऐसे में सवाल बेहद सीधा है—सरकारी योजना बच्चों को पोषण देने के लिए है या सिस्टम से जुड़े लोगों को पोषित करने के लिए?
प्रशासन चाहे तो एक जांच में खुल सकता है पूरा खेल
जिला प्रशासन और महिला एवं बाल विकास विभाग को चाहिए कि तत्काल स्वतंत्र जांच समिति गठित कर पिछले कई महीनों का रिकॉर्ड सुरक्षित कराए, अचानक आंगनबाड़ी केंद्रों का भौतिक सत्यापन कराए और संबंधित अधिकारियों, सुपरवाइजरों, कार्यकर्ताओं तथा आपूर्तिकर्ता समूह की भूमिका की जांच करे। यदि आरोप प्रमाणित होते हैं तो शासकीय राशि की वसूली के साथ जिम्मेदार लोगों पर कड़ी कार्रवाई और आवश्यकता पड़ने पर आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाना चाहिए।
क्योंकि मामला सिर्फ रेडी टू ईट के पैकेटों का नहीं है। मामला उन बच्चों के निवाले का है, जिनके नाम पर हर महीने लाखों और साल में करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं। अब देखना यह है कि प्रशासन इस पूरे मामले की तह तक जाता है या फिर कथित दबाव और मैनेजमेंट के आगे करोड़ों के सवाल भी फाइलों में दबकर रह जाते हैं।
