नई दिल्ली:- पितृपक्ष का हिंदू धर्म और गरुड़ पुराण में विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इस दौरान पितर सूक्ष्म रूप में अपने परिवार के पास जा सकते हैं। वहीं, गरुड़ पुराण के अनुसार, पितृपक्ष में कौए को भोजन देने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। आपने कई बार देखा होगा कि पितृपक्ष में लोग अक्सर कौआ न मिलने से परेशान भी रहते हैं। इसे देखकर मन में यह सवाल जरूर आता है कि आखिर कौए को ही पितृपक्ष में भोजन देने का इतना महत्व क्यों है। आइए पं. राकेश झा से विस्तार से जानते हैं कि पितृपक्ष में कौए को भोजन क्यों कराया जाता है और गरुड़ पुराण में इसके बारे में क्या बताया गया है।
पितृपक्ष के दौरान पितरों के नाम पर कौए के लिए अन्न-जल की व्यवस्था की जाती है। गरुड़ पुराण में कौए को यम का साथी बताया गया है। मान्यता है कि कौआ पृथ्वी से सारी जानकारी लेजाकर यमलोक तक पहुंचाता है। इसलिए पितरों को पितृपक्ष में अन्न जरूर देना चाहिए, ताकि वो भी तृप्त हों और यमराज के पास जब जाएं, तो आपके और आपकी पूर्वजों की अनुशंसा करें। मान्यता है कि कौए को अन्न देने से पितरों की ही तृप्ति नहीं होती, बल्कि जातक को भी यमराज की कृपा मिलती है।
कौए के भोजन खाने से पितरों की आत्मा को मिलती है शांति
गरुड़ पुराण के अनुसार, यदि पितृपक्ष में कौआ श्राद्ध का भोजन ग्रहण कर ले तो इससे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। और जब यह संदेश कौआ यमलोक पहुंचाता है तो यम भी खुश होकर उनका संदेश पितरों को देते हैं। पंडित राकेश झा बताते हैं कि पितृपक्ष में पूर्वज कौआ, बिल्ली, अथवा गाय, इनमें से किसी भी रूप में आपके घर पर आ सकते हैं। ऐसे में उनके लिए अन्न-जल की व्यवस्था जरूर करनी चाहिए। कहते हैं कि अगर अन्न का उच्छिष्ट कौआ खा ले तो इससे पितरों को तृप्ति मिलती है।
पुराण में बताया गया है कि एक बार यम ले कौए को यह वरदान दिया था कि तुम्हें दिया गया भोजन पितरों की आत्मा को शांति देगा। यही कारण है कि पितृपक्ष में ब्राह्मणों को भोजन कराने के साथ-साथ कौए के लिए भी अन्न-जल की व्यवस्था की जाती है। क्योंकि इस दौरान हमारे पूर्वज कौए के रूप में भी दस्तक दे सकते हैं।
