कोरबा DMF घोटाले में तत्कालीन कलेक्टर रानू साहू को 57.85 करोड़ रुपये की अवैध राशि मिलने का दावा ACB की जांच रिपोर्ट के हवाले से सामने आया था। अब गौरेला-पेंड्रा-मरवाही में तत्कालीन कलेक्टर लीना कमलेश मंडावी के कार्यकाल में 160 कार्यों की ₹17.47 करोड़ की स्वीकृति और ₹8.32 करोड़ के चेक जारी होने का मामला चर्चा में है। कथित 15 प्रतिशत कमीशन की चर्चा के बीच बड़ा सवाल—इस पूरे प्रकरण में किसे कितना आर्थिक लाभ मिला और जिम्मेदारी किसकी थी?
रायपुर/GPM | विशेष पड़ताल
छत्तीसगढ़ में जिला खनिज न्यास (DMF) की करोड़ों रुपये की राशि को लेकर सामने आए भ्रष्टाचार के मामलों ने सरकारी व्यवस्था और खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के नाम पर खर्च होने वाले सरकारी धन की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कोरबा DMF घोटाले में तत्कालीन कलेक्टर रानू साहू को 57.85 करोड़ रुपये की अवैध राशि मिलने का दावा ACB की जांच रिपोर्ट के हवाले से सामने आया था। नियमों में बदलाव, ठेकों के आवंटन कथित कमीशनखोरी के आरोपों ने इस मामले को प्रदेश के चर्चित भ्रष्टाचार प्रकरणों में शामिल कर दिया।
अब गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले का DMF मामला भी गंभीर सवालों के घेरे में है। यहां तत्कालीन कलेक्टर लीना कमलेश मंडावी के कार्यकाल में 160 कार्यों के लिए 17 करोड़ 47 लाख रुपये की प्रशासकीय स्वीकृति दिए जाने और लगभग 8 करोड़ 32 लाख रुपये के चेक जारी होने का मामला सामने आया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब रानू साहू के मामले में करोड़ों रुपये की कथित रिश्वत का खुलासा हो सकता है, तो GPM में DMF की स्वीकृतियों और भुगतान की पूरी प्रक्रिया की जांच कर यह क्यों नहीं पता लगाया जाना चाहिए कि कथित कमीशन का कोई नेटवर्क सक्रिय था या नहीं? और यदि था, तो उसमें किसकी क्या भूमिका थी?
लीना मंडावी के कार्यकाल में 17.47 करोड़ की स्वीकृति, आखिर किस आधार पर?
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में DMF की राशि से 160 कार्यों को प्रशासकीय स्वीकृति दिए जाने का मामला अब प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा विषय बन गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इन कार्यों को प्रबंधकारिणी समिति की बैठक और शासी परिषद के अनुमोदन के बिना स्वीकृति दिए जाने का उल्लेख 21 अक्टूबर 2026 के कलेक्टर कार्यालय के पत्र में किया गया है। हैरानी की बात यह है कि लगभग 17.47 करोड़ रुपये के इन कार्यों के लिए 8 करोड़ 32 लाख रुपये की पहली किस्त के चेक भी जारी किए गए। यह घटनाक्रम तत्कालीन कलेक्टर लीना कमलेश मंडावी के तबादले के आसपास का बताया जा रहा है।
जब निर्धारित समिति और शासी परिषद का अनुमोदन नहीं लिया गया था, तो इतनी बड़ी राशि की प्रशासकीय स्वीकृति किस नियम के तहत दी गई? किस अधिकारी ने फाइल का परीक्षण किया? किसने स्वीकृति जारी की और भुगतान के लिए चेक जारी करने की अनुमति किस स्तर पर दी गई?इन सवालों का जवाब संबंधित फाइलों, आदेशों और बैंक रिकॉर्ड की जांच से ही मिल सकता है।
DMF में 15 प्रतिशत कमीशन का कथित खेल, 10-3-2 का गणित क्या है?
इस पूरे मामले में सबसे गंभीर चर्चा कथित 15 प्रतिशत कमीशन को लेकर है। आरोपों और स्थानीय स्तर पर सामने आ रही चर्चाओं के अनुसार, 10 प्रतिशत तत्कालीन कलेक्टर, 3 प्रतिशत डिप्टी कलेक्टर और 2 प्रतिशत DMF शाखा के बाबू के नाम पर कमीशन का कथित गणित बताया जा रहा है। यदि इन चर्चाओं में कोई तथ्यात्मक आधार है, तो यह बेहद गंभीर मामला होगा। क्योंकि DMF की राशि खनन प्रभावित लोगों के विकास के लिए निर्धारित है, न कि अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए किसी अतिरिक्त कमाई का माध्यम।
सवाल यह है कि क्या ठेकेदारों से कार्य आवंटन के बदले कमीशन मांगा जाता था? क्या भुगतान जारी करने से पहले कथित हिस्सेदारी तय होती थी? क्या किसी एजेंसी या सप्लायर से इस संबंध में शिकायत मिली थी? क्या बैंक लेनदेन, फर्मों के खातों और भुगतान के बाद हुए वित्तीय लेनदेन की जांच हुई है?
इन आरोपों की पुष्टि अभी स्वतंत्र जांच से होनी बाकी है। लेकिन 160 कार्यों की स्वीकृति और करोड़ों रुपये के चेक जारी होने के घटनाक्रम को देखते हुए कथित कमीशन व्यवस्था की जांच की मांग महत्वपूर्ण हो जाती है।
₹2 लाख का काम और ₹12 लाख का चेक! किसने तैयार किया प्राक्कलन?
DMF के तहत कराए गए कार्यों की लागत और वास्तविक भुगतान को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। चर्चा है कि कुछ कार्यों में वास्तविक लागत और जारी चेक की राशि के बीच बड़ा अंतर था। उदाहरण के तौर पर लगभग 2 लाख रुपये के कार्य के लिए 12 लाख रुपये का चेक जारी किए जाने का आरोप सामने आया है। यदि यह तथ्य दस्तावेजों से प्रमाणित होता है, तो यह पता लगाना आवश्यक होगा कि लागत का प्राक्कलन किसने तैयार किया, तकनीकी स्वीकृति किसने दी, माप पुस्तिका में कितना कार्य दर्ज किया गया और भुगतान की अनुमति किस अधिकारी ने दी।
राजमेरगढ़ में निर्माण कार्य, पर्यटन विकास, आंगनबाड़ी भवनों की मरम्मत, हैंडपंप खुदाई, शौचालय निर्माण, हाईमास्ट लाइट और जनपद पंचायत भवन जैसे कार्यों में DMF राशि के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।आखिर इन कार्यों की जरूरत किसने तय की? क्या संबंधित विभागों से सहमति ली गई? क्या खनन प्रभावित आबादी को इन कार्यों से प्रत्यक्ष लाभ मिलना था? और क्या मौके पर हुए निर्माण तथा भुगतान की राशि का मिलान किया गया?
70:30 के अनुपात की अनदेखी का मामला
21 अक्टूबर 2026 के कलेक्टर कार्यालय के पत्र में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष खनन प्रभावित क्षेत्रों के लिए निर्धारित 70:30 के अनुपात का पालन नहीं होने का उल्लेख भी सामने आया है।
यदि निर्धारित अनुपात के विपरीत कार्यों का चयन किया गया, तो इसकी जवाबदेही किसकी होगी? क्या तत्कालीन अधिकारियों ने नियमों की अनदेखी की या प्रस्तावों की जांच में गंभीर लापरवाही बरती गई?
यह भी जांच का विषय है कि 160 कार्यों का चयन किन आधारों पर हुआ और क्या वास्तविक खनन प्रभावित क्षेत्रों की जरूरतों को प्राथमिकता दी गई थी।
रानू साहू और लीना मंडावी के मामलों में अंतर, लेकिन सवाल एक—सरकारी धन का हिसाब कहां?
कोरबा DMF घोटाले में रानू साहू के संबंध में ACB की जांच रिपोर्ट के हवाले से 57.85 करोड़ रुपये की अवैध राशि मिलने का दावा सामने आया था। दूसरी ओर GPM में लीना कमलेश मंडावी के कार्यकाल में DMF की स्वीकृति और भुगतान प्रक्रिया को लेकर प्रशासनिक अनियमितताओं के सवाल उठे हैं।दोनों मामलों की जांच और उपलब्ध साक्ष्य अलग-अलग हैं। GPM के मामले में फिलहाल लीना मंडावी को किसी निश्चित रकम की रिश्वत मिलने का प्रमाण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वित्तीय स्वीकृतियों, चेक जारी करने और कथित कमीशन के आरोपों की जांच नहीं होनी चाहिए। आखिर 17.47 करोड़ रुपये की स्वीकृति के पीछे पूरी प्रक्रिया क्या थी और 8.32 करोड़ रुपये के चेक किस आधार पर जारी हुए, इसका हिसाब सामने आना चाहिए।
वर्तमान कलेक्टर की कार्रवाई से निरस्त हुए 63 कार्य
वर्तमान कलेक्टर विजय दयाराम के. की कार्रवाई के बाद मामले में एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। 29 अक्टूबर 2026 को जारी आदेशों के अनुसार, DMF के अंतर्गत प्रबंधकारिणी समिति एवं शासी परिषद के अनुमोदन के बिना स्वीकृत 63 कार्यों को निरस्त किया गया। गौरेला जनपद के 37, मरवाही के 21 और पेंड्रा के 5 कार्य इसमें शामिल बताए गए हैं।
साथ ही, जिन कार्यों के लिए राशि जारी की जा चुकी थी, उसे DMF खाते में वापस जमा कराने के निर्देश भी दिए गए हैं।
अब सवाल यह है कि 63 कार्यों के निरस्त होने के बाद शेष 97 कार्यों की स्थिति क्या है? क्या सभी 160 कार्यों की स्वीकृति प्रक्रिया की जांच होगी? जिन कार्यों के लिए भुगतान हो चुका है, उनकी वास्तविक स्थिति का सत्यापन कौन करेगा? और क्या स्वीकृति एवं भुगतान के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होगी?
अब इन सवालों का जवाब देना जरूरी
- तत्कालीन कलेक्टर लीना कमलेश मंडावी के कार्यकाल में कितने DMF कार्य स्वीकृत हुए?
- 160 कार्यों के लिए 17.47 करोड़ रुपये की स्वीकृति किस अधिकारी के आदेश से जारी हुई?
- 8.32 करोड़ रुपये के चेक किसके हस्ताक्षर से जारी किए गए?
- कथित 15 प्रतिशत कमीशन की चर्चा का कोई दस्तावेजी आधार है या नहीं?
- क्या ठेकेदारों और सप्लायरों के भुगतान की स्वतंत्र वित्तीय जांच कराई गई?
- 2 लाख के कार्य पर 12 लाख के चेक जारी होने के आरोप की जांच हुई या नहीं?
- 63 कार्य निरस्त होने के बाद जारी राशि की कितनी वसूली हुई?
- क्या तत्कालीन कलेक्टर सहित स्वीकृति, तकनीकी परीक्षण और भुगतान प्रक्रिया में शामिल सभी अधिकारियों की भूमिका की जांच होगी?
- आखिर लीना मंडावी के कार्यकाल में DMF की 17.47 करोड़ रुपये की स्वीकृतियों का पूरा हिसाब क्या है? कथित 15 प्रतिशत कमीशन की चर्चा के पीछे वास्तविकता क्या है? और यदि किसी स्तर पर रिश्वत या अनुचित आर्थिक लाभ लिया गया, तो उसमें किसे कितना मिला?
यह सवाल किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि खनन प्रभावित जनता के पैसे का पूरा हिसाब मांगने के लिए है। शासन को चाहिए कि पूरे प्रकरण की स्वतंत्र वित्तीय एवं तकनीकी जांच कराए, बैंक लेनदेन की पड़ताल करे और दोष प्रमाणित होने पर संबंधित लोगों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करे। DMF की राशि जनता के विकास के लिए थी। अब जनता जानना चाहती है—17.47 करोड़ रुपये का हिसाब कौन देगा?
