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    Home » आज की राजनीति में देश को क्या दूसरा लालबहादुर शास्त्री मिलेगा
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    आज की राजनीति में देश को क्या दूसरा लालबहादुर शास्त्री मिलेगा

    By Tv 36 HindustanJanuary 11, 2022No Comments8 Mins Read
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    कृष्ण प्रताप सिंह
    छप्पन साल पहले वर्ष 1966 में ग्यारह जनवरी यानी आज की ही रात तत्कालीन सोवियत संघ के ताशकन्द में पाकिस्तान से युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर के कुछ ही घंटों बाद प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री का बेहद रहस्यमय परिस्थितियों में निधन हो गया तो देश में भीषण शोक की तहर फैल गई और पड़ोसी देश पर विजय का उल्लास फीका पड़ गया था.

    तब आधिकारिक तौर पर बताया गया था कि रात एक बजकर 32 मिनट पर उन्हें अचानक दिल का दौरा पड़ा और जब तक बचाने के लिए कुछ किया जाता, उनके प्राण-पखेरू उड़ गये. लेकिन वह दिन है और आज का दिन, उनके असमय बिछोह से संतप्त देशवासी मानने को तैयार ही नहीं होते कि उस रात मौत अपने स्वाभाविक रूप में उनके पास आई. उन्हें लगता है कि जरूर उसके पीछे कोई साजिश थी और वे उसके खुलासे की मांग करते रहते हैं.

    निस्संदेह, इस सम्बन्धी देशवासियों की भावनाओं का सम्मान होना चाहिए. लेकिन आज की तारीख में कहीं ज्यादा बड़ी त्रासदी यह है कि देश की राजनीति में गांधीवादी मूल्यों से समृद्ध नैतिकता, ईमानदारी और सादगी की वह परम्परा पूरी तरह तिरोहित होकर रह गई है, शास्त्री जिसके मूर्तिमंत प्रतीक थे.

    आज की राजनीति में वे शायद ही किसी नेता के रोलमाॅडल हो. ये नेता तो बहुत होता है तो उनकी जयंतियों व पुण्यतिथियों पर उनके सादा जीवन और उच्च विचारों के वाकये सुनाकर छुट्टी कर देते हैं. उनकी राह पर चलने का जोखिम उठाना कतई गवारा नहीं करते.

    इन वाकयों में भी ज्यादातर शास्त्री के देश का दूसरा प्रधानमंत्री बनने के बाद के होते हैं, जबकि वे सिर्फ 18 महीने इस पद पर रहे. इससे पहले जब देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, उन्होंने खुद को उसमें पूरी तरह झोंके रखा था. आजादी के बाद वे उत्तर प्रदेश में संसदीय सचिव और पुलिस व परिवहन मंत्री फिर केन्द्र में रेल व गृहमंत्री भी रहे थे.
    प्रधानमंत्री बनने के बाद कुछ दिनों तक उन्होंने महत्पूर्ण विदेश मंत्रालय भी अपने पास रखा था और जीवन के इनमें से किसी भी मोड़ पर उन्होंने अपने नैतिक मूल्यों को कतई मलिन नहीं होने दिया था. उनका शरीर भले ही ठिगना था, जीवन मूल्यों की ऊंचाई अपना सानी नहीं रखती थी. अपने परिवार की भयानक गरीबी के बावजूद उन्होंने इन मूल्यों की ऊंचाई से यावतजीवन कोई समझौता नहीं किया.

    चालीस के दशक में वे स्वतंत्रता संघर्ष के सिलसिले में जेल में बन्द थे तो ‘सर्वेन्ट्स ऑफ़ इंडिया सोसायटी’ नामक एक संगठन जेलों में बंद स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों की आर्थिक सहायता किया करता था. खासकर उन परिवारों की, जिनके पास गुजर-बसर का कोई और जरिया नहीं होता था. इनमें शास्त्री का परिवार भी था. एक दिन जेल में परिवार की चिन्ता से उद्विग्न शास्त्री ने जीवनसंगिनी ललिता शास्त्री को पत्र लिखकर पूछा कि उन्हें यथासमय उक्त सोसायटी की मदद मिल रही है या नहीं? ललिता का जवाब आया, ‘पचास रुपये महीने मिल रहे हैं, जबकि घर का काम चालीस रुपये में चल जाता हैं. बाकी दस रुपये किसी आकस्मिक वक्त की जरूरत के लिए रख लेती हूं.’
    इसके बाद की शास्त्री की प्रतिक्रिया की कल्पना कीजिए. वे न आश्वस्त हुए और न खुश. उलटे दस रूपये रख लेने वाली ललिता की बात से इतने असहज हो गये कि फौरन उक्त सोसायटी को लिखा, ‘मेरे परिवार का काम चालीस रुपये में चल जाता है. इसलिए अगले महीने से आप उसे चालीस रुपये ही भेजा करें. दस रुपयों से किसी और सेनानी के परिवार की मदद करें.’ ललिता उनसे मिलने जेल जातीं और अधिकारियों की नजरें बचाकर उनके लिए कुछ ले जातीं तो वे कितने नाराज होते थे, यह बात तो सबको पता है.

    आजादी के बाद चार अप्रैल, 1961 को वे केन्द्र में गृहमंत्री बने और केरल यात्रा पर गये तो एक दिन जब विश्राम के क्षणों में तिरुअनंतपुरम में कोवलम स्थित समुद्र तट पर कच्छे बनियान में बालू पर लेटे हुए थे, कलक्टर का चपरासी प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का कोई जरूरी पत्र लेकर आया. उसने कल्पना भी नहीं की होगी कि देश के गृहमंत्री वहां उसे ऐसे वेश में बालू पर लेटे मिल जायेंगे. इसलिए वह लेटे हुए शास्त्री को पहचान नहीं पाया. सो, उन्हीं से पूछने लगा, ‘भाई, गृहमंत्री कहां मिलेंगे? मुझे उनसे फौरन मिलना और प्रधानमंत्री का अर्जेन्ट पत्र देना है.’

    शास्त्री ने यह बताये बिना कि वे ही गृहमंत्री हैं, उससे कहा, ‘लाओ, वह पत्र मुझे दे दो. मैं गृहमंत्री को दे दूंगा.’ लेकिन चपरासी ने यह कहकर साफ मनाकर दिया कि कलक्टर साहब ने उसे गृहमंत्री के हाथ में ही देने का आदेश दे रखा है. शास्त्री उससे नाराज हुए बिना मुसकुराते हुए उठकर पास ही स्थित अपने ठहरने के कमरे में गये, सलीके से कुर्ता-धोती पहनी और बाहर आकर बोले, ‘ मैं हूं गृहमंत्री. लाओ, अब प्रधानमंत्री का पत्र मुझे दो.’ बेचारे चपरासी का चेहरा फक होकर रह गया!

    कम ही लोग जानते हैं कि वाराणसी में शास्त्री का घर एक बेहद संकरी गली में था. प्रधानमंत्री बनने के कुछ दिनों बाद उन्हें घर जाना हुआ तो समस्या थी कि उनकी कार वहां तक कैसे जाये? जैसी कि प्रशासनिक अधिकारियों की आदत होती है, शास्त्री को बताये बिना उन्होंने उनके घर जाने वाली संकरी गली को चैड़ी करने के लिए उसके किनारे के कुछ मकानों में तोड़फोड़ करने का फैसला कर लिया. शास्त्री को जैसे ही इसका पता चला, वे बहुत नाराज हुए और आदेश दिया, ‘मेरे घर जाने के लिए एक भी घर पर हथौड़ा न चलाया जाये. मैं हमेशा की तरह पैदल घर चला जाऊंगा.

    एक बैंक लोन
    मंत्री या प्रधानमंत्री के तौर पर सार्वजनिक धन की किसी भी तरह की बरबादी कतई मंजूर नहीं थी. एक बार उनके बेटे सुनील शास्त्री ने उनकी सरकारी कार से चैदह किलोमीटर की यात्रा कर ली तो उन्होंने उसकी एवज में उन दिनों की सात पैसे प्रति किलोमीटर की दर से सरकारी कोष में उसका खर्च जमा कराया. इसके बाद उन पर निजी कार खरीदने के लिए बहुत दबाव डाला गया तो पता करने पर उनके बैंक खाते में सिर्फ सात हजार रूपये निकले, जबकि उस जमाने में फिएट कार 12,000 रुपए में आती थी. तब उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से 5,000 रुपए कर्ज लेकर कार खरीदी. यह कर्ज चुकाने से पहले ही उनका निधन हो गया तो ललिता चार साल बाद तक उसे अपनी पेंशन से चुकाती रहीं.

    जब भी ज्यादा रोशनी की जरूरत न होती, शास्त्री अक्सर खुद उठकर अपने कार्यालय की बत्तियों के स्विच ऑफ कर देते थे. थोड़े ही दिनों बाद 1963 में उन्हें कामराज योजना के तहत गृहमंत्री पद से इस्तीफा दे देना पड़ा. वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर इसके बाद का एक वाकया बताया करते थे.

    उन्हीं के शब्दों में: एक शाम मैं शास्त्री के घर पर गया. ड्राइंगरूम को छोड़कर घर में हर जगह अँधेरा छाया हुआ था. शास्त्री वहाँ अकेले बैठे अखबार पढ़ रहे थे. मैंने उनसे पूछा कि बाहर बत्ती क्यों नहीं जल रही है? शास्त्री बोले-अब से मुझे इस घर का बिजली का बिल अपनी जेब से देना पड़ेगा. इसलिए मैं हर जगह बत्ती जलाना बर्दाश्त नहीं कर सकता.

    उन दिनों शास्त्री को बतौर सांसद 500 रूपये मासिक वेतन मिलता था और उतने में परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था. इसलिए अतिरिक्त आय के लिए वे अखबारों में लेख लिखा करते थे.

    कश्मीर जाने से इंकार किया शास्त्री ने
    उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद का वह वाकया बहुत प्रसिद्ध है, जिसमें ताशकंद में उन्हें खादी का साधारण-सा ऊनी कोट पहने देख सोवियत रूस के प्रधानमंत्री एलेक्सी कोसिगिन ने एक ओवरकोट भेंट किया था ताकि वे उसे पहनकर वहां की भीषण सर्दी का मुकाबला कर सकें. लेकिन अगले दिन उन्होंने देखा कि शास्त्री अपना वही पुराना खादी का कोट पहने हुए हैं. इस पर उन्होंने झिझकते हुए से उनसे पूछा, ‘क्या आपको वह ओवरकोट पसंद नहीं आया?’

    शास्त्री का जवाब था, ‘वह कोट वाकई बहुत गर्म है लेकिन मैंने उसे अपने दल के एक सदस्य को दे दिया है क्योंकि वह अपने साथ कोट नहीं ला पाया है.’ इसके बाद कोसिगिन ने कहा था कि हम लोग तो कम्युनिस्ट हैं लेकिन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ‘सुपर कम्युनिस्ट’ हैं. उन दिनों यह बहुत बड़ा ‘काम्प्लीमेंट’ था. शांतिदूत भी उन्हें उन्हीं दिनों कहा गया.

    यों, शास्त्री के कोट से जुड़ा एक किस्सा उनके प्रधानमंत्री बनने के पहले का भी है. 1962 का जब वे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव थे. प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें कश्मीर लाने को कहा तो उन्होंने साफ मना कर दिया. बहुत पूछने पर वजह बताई-कश्मीर में बहुत ठंड है और मेरे पास गर्म कोट नहीं है. यह जानकर पंडित नेहरू की आंखों में आंसू आ गये और उन्होंने उसी समय अपना कोट शास्त्री को दे दिया, जो शास्त्री के लिए बहुत सौभाग्यशाली सिद्ध हुआ. वे प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उसे पहनते रहे.

    सवाल है कि क्या यह सब पढ़ते हुए आपके दिलोदिमाग में कोई सवाल नहीं उठता? यह भी नहीं कि इस देश को दूसरा लालबहादुर शास्त्री कब मिलेगा? ऐसा भला कैसे हो सकता है?

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