उत्तर प्रदेश :– विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय शेष है, लेकिन लखनऊ के सियासी गलियारों में बिसात बिछनी शुरू हो गई है। 2024 के लोकसभा चुनाव परिणामों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति का मिजाज बदल दिया है, जिससे अब ‘सत्ता के सेमीफाइनल’ की तैयारी और भी आक्रामक हो गई है।
इस बार मुकाबला सिर्फ विकास के दावों पर नहीं, बल्कि जातियों के गणित और नए राजनीतिक कोड्स के बीच है। एक तरफ अखिलेश यादव का आजमाया हुआ PDA फॉर्मूला है तो दूसरी तरफ भाजपा का जवाबी D प्लान।
अखिलेश का PDA और 2024 की संजीवनी
समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी ‘PDA’ के जरिए भाजपा के हिंदुत्व कार्ड को कड़ी चुनौती दी है। 2017 और 2022 में पिछड़ी जातियों और दलितों का एक बड़ा हिस्सा भाजपा के पाले में चला गया था, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों में सपा ने इसी वर्ग में सेंधमारी कर 37 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया। अखिलेश अब इसी फॉर्मूले को 2027 के लिए अपना ‘ब्रह्मास्त्र’ मान रहे हैं। उनका आरोप है कि भाजपा सरकार जानबूझकर मतदाता सूची से PDA वर्गों के नाम हटा रही है, जिसे लेकर वह अभी से आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं।
भाजपा का ‘D’ प्लान : दलितों की घर वापसी की रणनीति
लोकसभा चुनावों में दलित वोट बैंक के छिटकने से भाजपा सतर्क हो गई है। अखिलेश के PDA की काट के लिए भाजपा ने अपना विशेष ‘D’ यानी ‘दलित’ प्लान तैयार किया है। भाजपा का मानना है कि सत्ता की सीढ़ी दलितों के समर्थन के बिना नहीं चढ़ी जा सकती। इस रणनीति के तहत भाजपा ने 15 प्रमुख दलित महापुरुषों का एक विशेष कैलेंडर तैयार किया है। पार्टी पूरे साल संत रविदास से लेकर मान्यवर कांशीराम तक की जयंती और पुण्यतिथि पर बड़े कार्यक्रम आयोजित करेगी। इसके जरिए भाजपा दलित समाज के बीच यह संदेश देना चाहती है कि वह उनकी सांस्कृतिक और वैचारिक विरासत की असली संरक्षक है। योगी सरकार की योजनाओं को सीधे दलित बस्तियों तक पहुंचाने के लिए ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ पर काम शुरू हो चुका है।
